शनिवार, 13 नवंबर 2010
भारत का मूल विचार --- हिन्दुत्त्व- 2
जीवन और चिन्तन की इस विशिष्टता को हम निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझ ने का प्रयास करें तो संभवतया सर्वाधिक प्रभावकारी किन्तु उतने ही जटिल इस विषय को समझने में कुछ सौविध्य हो सकता है।
- दुनियाँ में श्रेष्ठतम चिन्तन
- विश्वमें प्रथम बार जीवन को वैचारिक आधार्
- अपरिवर्त्य (नित्य) विनाशी( अनित्य) के बीच समन्वय
- वैश्विक कल्याण की दृष्टि
- विज्ञान एवं अध्यात्म का समन्वय
यह सत्य है की वैचारिकी और चिन्तन के क्षेत्र में भारतीय चिन्तन जिसे हम सब हिन्दुत्त्व के नाम से जानते हैं, विश्व का अकेला विचार नहीं है। किन्तु यह सत्य है और विरोधपूर्वक अथवा अविरोधपूर्वक, जिस किसी भी रूपमें प्रत्येक व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि हिन्दू चिन्तन दूनियाँ का सबसे पुराना चिन्तन है। यह अत्यन्त प्राचीन काल से आज तक मूल रूप में जीवित चिन्तन है, अतः चिरन्तन चिन्तन है। इस विचार का उदय मानव चेतना और उसकी चिन्तन शक्ति के अभ्युदय के साथ ही होता है। यह एक विशिष्ट प्रकार की विश्वदृष्टि है। इस विश्व दृष्टि के तीन आधार हैं। प्रथम तो यह कि सत् एक (एकं सत्) अर्थात् समस्त जगत् एक अखण्ड ईकाई है, सम्पूर्ण जीवन एक अविभक्त रचना है। विभाजन या भेद प्रतीति के स्तर ही है। भेद की प्रतीति भी अभेद के धरातल पर ही होती है। यदि सभी प्रकार के अनुभव का आधार एक अविभक्त अखण्ड सत् नहीं है तो समस्त अनुभव विविक्त संवेदना है। यह भी कहा जा सकता है कि मात्र विविक्त संवेदना की सत्ता होने पर अनुभव संभव ही नहीं है। क्योंकि अनुभव भव के पश्चात् है। जो है या हो गया है, उसके ज्ञान को ही अनुभव कहते हैं। एक अनुभव का दूसरे अनुभव के साथ संवाद आवश्यक है। इसलिये विविध अनुभव को संभव बनाने वाली एक अखण्ड सत्ता अपरिहार्य है। प्रपंच की स्थिति प्रपंचातीत पर ही आधारित है।
दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण सिद्धान्त है सबको साथ देखना सर्वमयता में देखना। सर्वमयता में देखना, सबको देखना, साथ देखना ही सही देखना है। इसलिये हिन्दू सर्वत्र जीवन देखता है, मृत्यु नहीं। मृत्यु तो खण्ड में देखना है। कुछ देखना और कुछ को नहीं देखना है, भेद दृष्टि से देखना है। भेद दृष्टि भय उत्पन्न करती है। पराये और परायेपन के होने के अतिरिक्त भय कुछ भी नहीं है। जो अपना नहीं है वह भयभीत करता है।
नाश तो भारत की धर्म दृष्टि में कभी स्वीकार ही नहीं किया गया है। कुछ भी नष्ट नहीं होता है। जिसे सब नाश समझते हैं हिन्दू उसमें रुप परिवर्तन मात्र देखता है। इसीलिये मृत्यु देहावसान मात्र है। पंचमहाभूतों का विलयन मात्र है, विलगाव है नाश नहीं। स्थूल से सूक्ष्म तथा सूक्ष्म से स्थूल होने की प्रक्रिया जन्म और मृत्यु है। नाश शब्द न और आश् शब्द के योग से बना है। जिसका अर्थ है जैसा था वैसा नहीं है। इसलिये जब किसी वस्तु को नश्वर कहा जाता है तो इसका तात्पर्य परिवर्तनशीलता ही होता है। नहीं है समाप्त हो गया जैसे शब्द तो भारत की संस्कृति में कभी स्वीकृत ही नहीं रहे हैं। जो नहीं है, वह नही था। जो है, वह था और वह रहेगा। इस रहने और न रहने के बीच ही संभूति है। संभूति अर्थात् जो होता रहता है। यही होने की प्रक्रिया जब स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती है तो हम मृत्यु समझते हैं और जब सूक्ष्म से स्थूल की ओर होती है तो जन्म समझा जाता है।
इस दृष्टि को विज्ञान की तुला पर् तौला जा सकता है तो अध्यात्म की भूमि पर भी समझा जा सकता है। महर्षि अरविन्द के शब्दों में कहा जाय तो यह एक ही सत्ता के आरोह एवं अवरोह की ऐसी विधि है जिसका सैद्धान्तिक रुप से एक साथ भौतिक विज्ञान, जीवन विज्ञान तथा समाज विज्ञान में किया जाना सहज और सरल है।इसे सात्मीकरण और विभेदीकरण के आधार पर इस रुप में समझ सकते हैं कि जहां रूपं रूपं पर्तिरूपं बभूव – एकोsहं बहुस्यामः की सृष्टि प्रक्रिया है तो दूसरी ओर प्रतिरूप से विरूप होने की प्रणाली भी है। प्रतिरूपण बाँधता है, बांटता है। टुकडो में बंटी चैतन्य शक्ति को एकाकार करना ही मुक्ति है। मुक्ति इस लोक से परे घटने वाली कोई घटना नहीं है। अपितु इसी काल में, इसी जीवन में प्राप्य है क्यों कि यह और कुछ नहीं टुकडो में देखने वाली दृष्टि का नाश है। “सर्वदृष्टि प्रणाश” की यह मान्यता वैदिक एवं बौद्ध दोनो प्रणालियों को सहज स्वीकार है।
यह बात कुछ अजीब सी लगती है। इसलिये अजीब लगती है कि हमनें आधुनिकता के नाम पर एक विशिष्ट किस्म का चश्मा अपनी आँखों पर चढा लिया है जो इन्द्रियगोचर जगत् से परे किसी अन्य सत्ता की संभावना को इस आधार पर अस्वीकार नहीं करता कि सत्यापनीयता संभव नहीं है।सत्यापन किसी सत्तावान पदार्थ के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त नहीं है। विचारों के जगत (World of Ideas) में तो यह कथमपि संभव नहीं है। यदि इन्द्रिय गोचरता को ज्ञान की अनिवार्य शर्त मान लिया जाय तो ज्ञान में नवन्वोन्मेष की संभवना ही समाप्त हो जायेगी। इसी कारण भरतीय विचार प्रणाली ने इन्द्रियगोचरता को ज्ञान की उपष्टम्भक भूमिका तो स्वीकार की है लेकिन ज्ञान की अनिवार्य शर्त नहीं माना है।
पश्चिम में प्रमाणवादी चिन्तन ( Positivist Thinking) के उदय के पूर्व ही कुछ अन्य ऐसे विचार दिखाई देते हैं जिसके फल स्वरूप विश्व के उद्गम एवं अन्त की भौतिक, यान्त्रिक तथा संघर्षात्मक रचना की मान्यता को स्वीकृति प्राप्त हुई। यह आकिर्मिडीज की इस स्थापना के साथ शुरु होता है कि जगत् एक यान्त्रिक रचना है यान्त्रिक नियमोंके उपयोग से इसका रुप परिवर्तन हो सकता है। इसके साथ ही डार्विन के जैवविकासवाद तथा सुमेरन की की समाज की व्यावसायिक उद्यमशीलता ( Society is an Enterprise ) के सिद्धान्त ने इसकी जडात्मकता और यान्त्रिकता, को कठॊर सिद्ध तथ्य के रुप में स्थापित किया है। वस्तुतः पश्चिम में विकसित इस जगत की जडात्मकता और यान्त्रिकता का सिद्धान्त उसके सामी मूल में ही छिपा हुआ है। सामी धर्मों में पुरुष के अतिरिकत किसी अन्य जीव में आत्मा को मान्यता नहीं है। बडे विरोध और दबाव के बाद चर्च ने स्त्री देह में आत्मा को स्वीकार किया है। किन्तु यह मान्यता भी अभी उनकी पान्थिक सीमा में समानता के स्तर पर नहीं पहुंच सका है। इसके विपरीत भारतीय विश्वदृष्टि में इस जगत् तथा जगत से परे सर्वत्र एक ही चैतन्य के अभिव्य्जना को स्वीकार किया गया है। जिसने इस विश्व को जड यान्त्रिकत का शिकार नहीं होने दिया, न तो इस् विश्व को मनुष्य के उन्मुक्त उपभोग के साधन के रुप में भी नहीं स्थापित होने दिया।
भ्हारटीयता का हर्द यही है यही वह तीसरा विचार बिन्दु है, वह स्थला है जंहा भारत भारत भाव को प्रकर्ष रुप से प्रकाशित होता है।यह है मनुषय की सर्व कार्यक्षम क्षमता और असिंअ अधिकार की स्वीकृति के साथ ही स्वजन्य सीमांकन। उपनिषद् इसी को तेन त्यक्तेन भूञ्जीथा के भाव के साथ प्रकट करता है। वस्तुतः भोग कर्म का हेतु तथा कारण दोनो है। हेतू होने का अर्थ है जिसको अभिलक्ष्य करके कर्म में प्रवृत्ति होती है। लाघव से लक्ष्य सिद्धि होने पर गौरव प्रयास कोई नहीं करना चाहता है। इसी लाघव दृष्टि का परिणाम है कि पश्चिमी जीवन में धरती पर स्वर्ग रचने का प्रयास होता रहा है। उसका स्वाभाविक निहितार्थ उपभोग के भौतिक साधनो की उपलब्धि अर्जित करना ही है। इसके समानान्तर भारतीयता कर्म और विकर्म के बीच सन्तुलन है। उपभोग की स्वीकृतिपूर्वक उपभोक्तावाद का निषेध तथा त्याग का अंगीकरण है। त्यागपूर्वक उपभोग , सब कुछ स्वयं का होते हुये भी स्वयं को उपभोग का एकमेव अधिकारी न समझना ही त्यागपूर्वक उपभोग है। यह सृष्टि नित्य है, ईश्वर की चैतसिक अभिव्यञ्जना है। यह् अभिव्यञ्जना मनुष्य तथा मनुष्येतर सबके लिये समान ही है। पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती के लिये भी समान है। इसी कारण से यहां धर्मदृष्टि को सनातन कहा गया है। सनातन की स्वीकृति एक ऐसा विशिष्ट विधान है जो परिवर्तन और तथा नित्यता के बीच समन्वय करता है। यह मानवीय व्यवहार में जडता का निषेध तो करता ही है पूर्ववर्ती के निषेध का भी निषेध है। सनातनता पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती के बीच सातत्य है। साधन तो युग और काल की गति के साथ परिवर्त्य है। नितान्त प्राचीन के स्थान पर नित नूतन साधनों का अविष्करण करते हुए अधुनातन साधन सम्पन्नता तो वरेण्य है। पर साध्य का संशोधन न तो सम्भव है न तो अपेक्षित ही है। इस विषय में पूर्व में भी चर्चा कर चुका हूँ कि बन्धन को तोडना सीमाबद्धता को अस्वीकार करते हुए नि:सीम होना तो इस दृष्टि का स्वभाव ही है। यही स्वभाव-साध्य भी है किन्तु इस समय साध्य का अर्थ वैरागी होना नही है अपितु समग्र सक्रियता है। अपने परिवेश के प्रति सजग होना जिम्मेदार होना, सबका अवधान करते हुए मुक्ति की कामना संभव है। यह अवधान मात्र समकालीन के प्रति नही है अपितु पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती के प्रति भी है। इसलिए भावी जीवन के प्रति, वैयक्तिक नही सामूहिक जीवन के प्रति उत्तरदायित्व का भाव तथा उसकी पूर्ति का उपक्रम ही कर्म है। “ऋणत्रयं अपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्”। “पितृ ॠण,देव ॠण तथा ॠषि ॠण के रुप में तीन ॠण व्यक्ति के जीवन मॆं जन्म से प्राप्त है। इन ॠणॊं की पूर्तिपूर्वक ही, बन्धन से मुक्ति का मार्ग खुलता है। किन्तु तीन ॠणॊंसे बात समाप्त नही होती है। मनुष्य अपने जन्म से लेकर समग्र विकास यात्रा मे लोक से कुछ प्राप्त करता है, समाज से लेता है उसे भी ॠणके रुप में स्वीकार करते हुए नृ ॠण के रुप में एक चतुर्थ आयाम दिया गया।
ये ॠण अपने आप में मनुष्य के लौकिकीकरण या धर्म के ऐहिक जीवन के सरोकार को प्रतिपादित करने वाले हैं। पिता का ॠण पिता को नहीं लौटाना है। इसे पुत्र को सौपना है। गुरु का या आचार्य का ॠण गुरु दक्षिणा के रुप में आचार्य को नही वापस करना है, अपितु ज्ञान विज्ञान की परम्परा का विकास करते हुए उसे अपने आचार्य से प्राप्त के साथ उत्तरवर्ती पीढी को देना है।
यज्ञ अर्थात् कर्म की श्रृंखला-- कर्म तथा कर्मफल की कामना के लिए कर्म न करते हुए इदम् इन्द्राय न मम्, इदम् राष्ट्राय न मम् की भावना के साथ कर्म अकर्म है ।कर्तृत्वाभिमान ही सभी प्रकार के बंधनों का कारण है। कर्तापन का बोध व्यक्ति को फलोपभोग की कामना से बांधता है। यही सभी बन्धनो का मूल है। करते हुये बी नकरने का भाव मनुष्य को मुक्ति की ओर प्रगमित करता है। यह मुक्ति सहज नहीं है, कठिन तप है। इसपर सहज और सुकर तभी बनाया जा सकता है जब इसे सामाजिक व्यवस्था का भाग बनाया जाय। ऋणों की अवधारणा इसका प्रस्ताव है। दार्शनिक चिन्तन तथा अनुभव के विश्लेषण से प्राप्त सृष्टि के गुढ रहस्यों को जन साधारण के लिये प्रस्तुत करने का वैचारिक एवं व्यवहारिक उपक्रम है।
अकर्म का अर्थ कर्महीनता नहीं है। नैष्कर्म्यसिद्धि सम्पूर्ण सक्रियता है। इस सक्रियता का परिणाम रहा है कि तकनीक में उपयोगिता की चिन्ता और कामना किये बिना विज्ञान के विकास के विकास का प्रयास धार्मिक जीवन के पर्याय के रुप में देखा गया है। विद्या की उपासना अमरत्व के लिये अपेक्षित और आवश्यक मानी गयी है। विद्या की अवाप्ति का प्रथम सोपान मृत्यु पर विजय प्राप्त करना है। इस विजय प्राप्ति के उपक्रम में विद्या और अविद्या दोनो का समन्वय चाहिये। एक की उपासना में रत अन्धकार में जाता है। किन्तु अविद्या अर्थात् भौतिक दृष्टि से जगत् को जाननने समझने का प्रयास कभी भी उपेक्षा का विषय नहीं रहा है।
दुनियाँ के तमाम उपासना पन्थों ने विज्ञान की प्रगति तथा धर्मग्रन्थों के जगत विषयक व्याख्या के भेद पर वैजानिक अन्वेषणाओं का जिस प्रकार कठोर प्रतिवाद किया है वैसा कठोर प्रतिवाद नतो भारत में दिखाई देता है न तो भारत के वैचारिक धरातल पर संभव ही था। इसकि स्पष्ट करने के लिये मात्र एक उदाहरण ही पर्याप्त है कि आचार्य वराहमिहिर जैसा व्यक्ति उद्घोषणा करता है कि यवन म्लेच्छ होते हुये भी ऋषि के समान पूज्य हैं क्यों कि ज्योतिष के क्षेत्र मेंउन्होने प्रामाणिक ज्ञान अर्जित किया है। इस घोषणा का महत्त्व इसबात से समझा जा सकता है कि मन्त्रों के साक्षात्कार कर्त्ताओं के अतिरिकत किसी अन्य को ऋषि नहीं कह जाता है। तथापि वराहमिहिर यवन अध्येताओं को मात्र ऋषि कहने तक सीमित नहीं है अपितु वे उन्हे ऋषियों के समान ही पूज्य भी बताते हैं।
ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में सांस्कृतिक परिवेश से परे जाकर श्रेष्ठ सिद्धान्तों को ग्रहण करने तथा मान्यता देने की प्रणाली भारतीय परंपरा में प्रारंभ से ही प्राप्त है। इसे ऋग्वेद के इस मन्त्र में देखा जा सकता है कि आनो भद्राः क्रत्वोयन्तु विश्वतः, अर्थात श्रेष्ठ और शुभ विचारों को सम्पूर्ण विश्व से आने दो। इस के पीछे का वैचारिक कारण यह है कि हिन्दु जीवन दर्शन में यह मान्यता पर विश्वास नहीं करता है कि अन्तिम बात ईश्वरीय आदेश के रुप में कह दी गयी है। अब उससे आगे और कुछ भी नया कहे जाने की संभावना समाप्त हो गई है।
भारतीय धर्म दृष्टि को समझने के लिये सर्वाधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है संस्कार प्रणाली को समझना, यज्ञ के निहितार्थ एवं फलितार्थ को समझना। बिना संस्कार और यज्ञ को समझने बिना कॊई भी व्यक्ति हिन्दुत्व को नहीं समझ सकता है। संस्कार प्रकृत में सगुण एवं सचेत हस्तक्षेपपूर्वक संस्कृत का उदय है। इसीलिये जब हिन्दु जीवन की ओर देखता है तो मात्र सर्वमयता में नहीं देखता है संस्कारित सर्वमयता में देखता है। इस संस्कारित सर्वमयता में देखने का परिणाम है कि अशुभ का समानान्तर अस्तित्व इस संस्कृति में स्वीकार नहीं है। अशुभ और कुछ नहीं है यह मनुष्य के अज्ञान का परिणाम है, फल है। ज्ञान की उपलब्धि के साथ ही अविद्या का परिलोप हो जाता है। अज्ञान के तिरोभाव तथा ज्ञान के आविर्भाव के लिये संस्कारों की आवश्यकता होती है। संस्कार प्राकृत जीवन और प्राकृत शरीर में संस्कृति का उद्भावन है। शरीर पिण्ड को अनवरत संस्कारित कर उसे तेजोमय चैतन्यावच्छिन्न बनाने की विधि ही इस धर्म पथ को सनातन तथा सार्वकालिक आदर्श प्रणाली के रुप मे ढालती है।
संस्कार को हम सामान्य रुप में औपचारिक कर्मकाण्ड से अधिक कुछ भी नहीं समझते हैं। किन्तु संस्कार वाह्य आडम्बर या किसी धार्मिक विधि के क्रिया पक्ष मात्र नहीं हैं। अपितु यह श्रेष्ठ होने तथा तथा श्रेष्ठतम बनाने की भावना का उन्मेष है। जो प्राकृत है उसे संस्कृत करना अर्थात् और अधिक तोषदायक बनाना , सर्वसंगत बनाना ही संस्कार है। जीवन का प्रत्येक सोपान कर्मों की अविच्छिन्न श्रृंखला का परिणाम है। किन्तु कर्म परिणाम से उद्भूत जीवन को यथावत न रहने देना, अपितु सचेत मानव हस्तक्षेप के द्वारा उसे सगुण एवं सुष्ठु बनाना ही संस्कारों का वास्तविक उद्देश्य है।
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
सांस्कृतिक कार्यक्रम-
संस्कृति मनोरंजनपरक नहीं होती है इसलिये सांस्कृतिक कार्यक्रम मनोरंजन नहीं है।
यद्यपि की इसकी अभिव्यक्ति के साधन नृत्य, गान, वादन तथा अन्य दृक श्रव्य माध्यम ही होते हैं।
वस्तुतः संस्कृति की अनुभूति इन माध्यमों में सहजता से होती है।
क्योंकि ये ललित कलायें तथा मञ्चकलायें स्वयं में इतने चैतसिक प्रकार की होती है कि इनमें सभ्यता का भौतिक पक्ष अत्यन्त अप्रभावी रहता है।
इसके विपरीत सभ्यता से जुडी चीजें जैसे शासन प्रणाली, परिवहन और संचार के साधन, आवास आदि में भौतिक सुविधा का पक्ष महत्वपूर्ण होता है। अतः इसमें सांस्कृतिक पक्ष प्रखरता के साथ प्रकट नहीं होता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम का अर्थ नाच गाना नहीं है। किन्तु इसमें Folk का पक्ष इतना प्रभावी होता है कि सांस्कृतिक कार्यक्रम का अर्थ मनोरंजन के कार्यक्रम समझा जाने लगा है।
अब यह प्रश्न अवश्य है कि संस्कृति क्या है? तो इसका सहज और सीधा उत्तर है कि संस्कृति मनुष्य की वह सृजनात्मक गतिविधि है जो उसे प्राकृतिक स्थितियों से उपर उठाती है। उसके आहार, निद्रा भय मैथुन आदि स्वाभाविक प्रवृत्तियों को मूल्य व्यवस्था से नियामित और नियन्त्रित करती है।
नियमन और नियन्त्रण के इन आधारों को व्यक्ति तक संप्रेषित करने के लिये जिन उपायों का उपयोग किया जाता है वे प्रदर्शनात्मक प्रकृति के ही होते है। अतः उन क्रियाओं को अन्ततः सांस्कृतिक कार्यक्रम कहा जाने लगता है।
इसका एक दुष्परिणाम यह भी है कि अपसंस्कृति के भी प्रसार का भी यही तरीका है अतः इसे सांस्कृतिक गतिविधि से अलग करने का कार्य भी एक सचॆत और सक्रिय सामाजिक व्यवहार की अपेक्षा करता है।
जिसके कारण लोक कलाओं मे धार्मिक एवं अध्यात्मिक मूल्य भी डाले जाते है जिससे अपनी संस्कृति के प्रति उत्तराधिकार में प्राप्त श्रद्धा के कारण उसे अक्षुण बनाये रखें।
रविवार, 24 अक्टूबर 2010
भारत का मूल विचार --- हिन्दुत्त्व
भारत शब्द का अर्थ ही है विश्व की प्राचीनतम संस्कृति, श्रेष्ठतम जीवन प्रणाली,वितरण की समतामूलक ममतायुक्त समाजविधि, संस्कृतिनिष्ठ भक्तिपूरित राष्ट्रीयता, सर्वसमन्वयकारी सर्वसमावेशी उपासना प्रणाली। यह अभ्युदय और निःश्रेयस् का ऐसा धर्म संस्थान है जो रुढियों का विलोपन करने तथा लक्ष्य की संप्राप्ति के नये पथ को स्वीकार करने के लिये सहज प्रस्तुत है। जो जातीय सभ्यता के निषेधपूर्वक जातीय वैशिषट्य को सार्वजनीन् बनाने का अनुपम प्रस्ताव है।
विचारों के इतिहास पर एक विहंगम दृष्टि डाली जाय तो सहज एवं निःशंक रुप से यह कहा जा सकता है कि भारतीयता या हिन्दुत्त्व सत् एवं ऋत् का एक ऐसा गठबन्धन है। जिसमें सभी प्रकार की वैयक्तिक विशिष्टताओं का समग्र के लिये समर्पण एवं समग्र के वैशिष्ट्य का सभी विशेषों में आप्लावन होता है।
इस संस्कृति या विचार परंपरा की यह महनीय विशेषता है कि इसमें शेष विश्व के कथित अधुनातन मूल्यों को दूनियाँ के इतिहास में प्रथम बार अभिव्यक्त एवं प्रयुक्त किया गया है। जब आधुनिक विश्व १९८० के बाद नयी करवट ले रहा था उत्तर आधुनिकता के नये ढाँचे को स्वीकार करते हुये वैश्विक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को संरक्षण के लिये बहुलवादी समाज रचना को वैश्विक स्वीकृति प्रदान कर् रखा था। तब भारत की समझ तथा हिन्दुत्व के उत्स की पहचान रखने वाले लोगों को अथर्ववेद का पृथ्वीसूक्त अत्यन्त स्वाभाविक रूपसे इस प्रकार की समाज रचना का सूत्र प्रस्तावित करता हुआ दिखा। यही ऐसे कारण रहे हैं कि यह विचार सैद्धान्तिक रुप में तो दूनियाँ में श्रेष्ठतम तो रहा ही है। व्यवहारिक अनुप्रयोग की दृष्टि से उत्कृष्टतम चिन्तन का प्रथम प्रयोक्ता भी है। साथ ही इस विचार प्रणाली की त्रिकालाबाधित प्रासंगिकता भी सिद्ध है।
यहाँ ज्ञान एवं कर्म, बोध एवं आचार के बीच अद्वैध की स्थिति सहज ही मान्य है। इस मान्यता ने हिन्दुत्व को एक ऐसी जीवन प्रणाली के रुप में विकसित किया जो अपरिवर्तनशील लगता है। किन्तु यह अपरिवर्तनशीलता भौतिक नहीं है। भौतिक संसार तो परिवर्तनशील ही है, परिवर्तन है तो संसार है।संसरण ही संसार है। यह संसरण नहीं तो संसार नहीं। यह संसरण या गतिशीलता संसार का धर्म है इसको स्वीकार करना तथा सभी प्रकार के परिवर्तनों को अपरिवर्त्य आधार पर अधिष्ठित मानना अर्थात् अपरिवर्तनशील मूल भित्ति पर भौतिक परिवर्तनो को स्वीकृति देते हुये आगे बढने वाली जीवन प्रणाली की स्थापना हिन्दुत्व है।
विश्वतोमुखता को ध्यान में रखते हुये हिन्दुत्व की वैचारिक अवधारणा का विश्लेषण उसे अपनी वैचारिक मर्यादा में वैश्विक कल्याण के श्रेष्ठतम चिन्तन के रुप में प्रस्तावित करता है। सर्वे भवन्तु सुखिनः मात्र भौतिक स्तर पर् सबके सुख की कामना नहीं है अपितु कायिक वाचिक एवं मानसिक स्तरों पर सबके कल्याण का विचार है। भवन्तु सर्व मंगलम् इस विचार प्रणाली का ध्येय है।
हिन्दुत्व का वैशिष्ट्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास है।यह जीवन प्रणाली ऐसी विधि है जो भौतिकता और आध्यातिम्कका समन्वय कर समत्व के मार्ग का प्रतिपादन करती है। हिन्दुत्व अपने मूल उत्स में अनादि से अनन्त तक विस्तृत अखण्ड काल में मानव की जीवन यात्रा का वह अनुपम पथ है जिसमें व्यक्ति वर्तमान में स्थित हो कर अतीत अएवं अनागत दोनो के साथ स्वयं को सम्बद्ध करता हुआ अपनी दैशिक एवं कालिक सीमाओं को बहुतर विस्तार देता है।
दुनियाँ में प्रचलित विविध जीवन दृष्टियों में हिन्दुत्त्व की जीवन दृष्टि एक विशिष्ट जीवन दर्शन का प्रस्ताव करती है। इसके शतशः कारण हैं कि हिन्दुत्व को अलग एवं विशिष्ट समझा जा सके। किन्तु अलग या विशिष्ट होना इसका वैशिष्ट्य नहीं है। अपितु इसकी सर्वसमावेशिता तथा सात्मीकरण की अनुपम प्रणाली ही इसे अन्यों से अलग एवं महत्वपूर्ण बनाती है।
रविवार, 29 अगस्त 2010
रच दें पुनः धर्म युद्ध
²Éपर का महाभारत अधिकार खो देने वाले राजकुमारों के द्वारा किये गये संघर्ष की कहानी है। उस युग में धर्म ऊंघ रहा था। आज जब कलि का प्रथम चरण है। धर्म पहली नींद सोया हुआ है। विग्रहवान धर्म राम बन्दी हैं। राजसत्ता ने अखिल ब्रह्माण्ड नायक कोटि कॊटि विश्व के प्रभु राम पर कब्जा कर लिया है। न्याय तथा दुष्ट दलन के एकमेव भरोसा राम स्वयं न्याय के लिये आस लगाये बैठॆ हैं। अधर्म और अन्याय के नाश के लिये प्रकट हुये भगवान स्वय़ं न्याय के लिये अपलक आस लगाये बैठे हैं। दुष्ट दलन, के लिये अवतरित प्रभु , अशरणशरणदाता करुणामूर्ति स्वयं शरण की तलाश कर रहे हैं। इससे अधिक दुःखदायी कोई बात नहीं हो सकती है यही भारत में नये महाभारत की परिस्थिति है।
न्यायालय का निर्णय आने वाला है। कोटि कॊटि हिन्दु जन की अविचल श्रद्धा के केन्द्र राम जन्मभूमि पर मालिकाना हक का फैसला आने वाला है, यह एक ऐसा मुकदमा है जिसमें स्वयं राम वादी है। न्याय के स्रोत, विग्रहवान धर्म को भी अदालत जाना पडा है। यह कोई खराब बात नहीं है न्याय की तुला पर सब समान है इसका इससे श्रेष्ठ उदाहरण भी नहीं हो सकता। पर प्रश्न यह है कि क्या राम को न्याय मिलेगा। क्या अशरण-शरण, त्रैलोक्य नायक सर्वदुःखभंजक असुर-दलदलन-तत्पर मर्यादा पुरुषोत्तम को शरण मिलेगी।
राम को राम का ही न्याय चाहिये। रामराज्य का न्याय चाहिये। सुकरात को मिले पश्चिमी लोकतन्त्रवादी न्यायालय का न्याय नहीं। तर्क से ,जिरह से , युक्ति से और अभियुक्ति से न्याय नहीं निर्णय मिलता है। ध्यान रहे निर्णय न्याय हो यह जरूरी नहीं है। व्यक्ति न्याय तभी दे सकता है जब वह व्यक्ति की परिधि से उपर उठ कर स्वयं विग्रहवान न्याय बन जाता है, न्यायमूर्ति हो जाता है। इसीलिये राम को विग्रहवान धर्म कह गया है वे सब के साथ न्याय करते हैं। कैकेयी, ताडका, सूपर्णखा , मारिच खर-दुषण त्रिसिरा सहित सभी असुरो साथ तो करते ही हैं, कुत्ते और गिलहरी को भी न्याय देते हैं। पर जब स्वयं न्यायमूर्ति, धर्मविग्रह न्यायालय में हो तो उसे न्याय कौन देगा। यह प्रश्न विकट है सकल विश्व के जन्म मरण के समय और स्थान एवं स्वरूपका निश्चय करने वाले प्रभु भी अपनी इस मायिक लीला के विस्तार के चक्कर में फंस गये हैं। उनकी ही रचना उनके स्वरुप और स्थान को संशययुक्त कर रही है।
यही धर्म के क्षरण का काल खण्ड है। जब स्वयं धर्म ही प्रश्नों के दायरे में है। ज्योतिपुंज को दीपक की रोशनी में देखने का प्रयास हो रहा है। इससे अधिक कठिन दिन क्या होगा कि ईश्वर से उसके होने का प्रमाण मांगा जाय। अतः इस विकट स्थिति में जन जन के प्राण धर्म के विग्रह राष्ट्र के आराध्य राम को न्याय मिले, ज्योतिपुंज से काले बादल छंटे धर्मोष्मा से धरती उष्म धर्मा हो, प्रशीतित न्याय प्रवाहित हो, इसके लिये प्रिय अप्रिय किसी को भी धर्मार्थ दण्डित करने का साहस हर हृदय में जगाना होगा।
न्याय कभी भी मात्र याचना से नहीं मिलता है, याचना से तो मात्र निर्णय मिलता है। पराक्रम न्याय की कसौटी है। अतः समाज को अपना पराक्रम दिखाना होगा। फिर एक बार हूंकार भरनी होगी। राम के देश में राम जन्म भूमि पर विवाद हो यह पराक्रम को चुनौती है। प्रत्येक भारतवासी की अस्मिता पर उठा प्रश्न है।
यही अवसर है अपनी अस्मिता की पहचान को स्थायी करने का। आइये अनादि इतिहास से चल रही धर्म रक्षण की अपनी गौरव गाथा को एक बार पुनः दुहरायें, नये शब्दों में नयी भाषा में अपने राममय इतिहास का पुनर्लेखन करॆं।
सोमवार, 23 अगस्त 2010
ईसाईयत का शताब्दी अभियान???????????
ईसाईयत का शताब्दी अभियान???????????
by Rajaneesh Shukla on Saturday, August 2३, 2010
'क्रिश्चियन वेदान्तिज़्म' पर एक लेख में श्री आर. गोर्डन मिल्बर्न लिखते हैं, ''भारत में ईसाई धर्म को वेदान्त की आवश्यकता है। हम धर्मप्रचारकों ने, इस चीज़ को जितनी स्पष्टता से समझ लेना चाहिए था, अभी नहीं समझा है। हम अपने निजी धर्म में स्वतंत्रता और उल्लास के साथ आगे नहीं बढ़ पाते हैं; क्योंकि ईसाई धर्म के उन पहलुओं को व्यक्त करने के लिए जिनका सम्बन्ध ईश्वर की सर्वव्यापकता से अधिक है, हमारे पास अभिव्यक्ति के प्रर्याप्त शब्द और प्रकार नहीं हैं। एक बहुत ही उपयोगी कदम यह होगा कि वेदान्त-साहित्य के कुछ ग्रंथों या अंशों को मान्यता दे दी जाए, और उन्हें 'विधर्मी ओल्ड टेस्टामेंट' की संज्ञा दी जा सकती है। तब चर्च के धर्माधिकारियों से इस बात की अनुमति मांगी जा सकती है कि उपासना के समय न्यू टेस्टामेंट के अंशों के साथ-साथ, ओल्ड टेस्टामेंट के पाठों के विकल्प के रूप में, इस विधर्मी ओल्ड टेस्टामेंट के अंश भी पढ़े जा सकते हैं। इंडियन इंटरप्रेटर 1913 ।
१९११ में जो प्रस्ताव था वह २०१० आते आते ईसाई मत मॆ स्वीकार्य तथ्य हो गया। पर यह सर्व धर्म समभाव नहीं है इसके निहीतार्थ को विवेचित करने की आवश्यकता है। देश केलिये यह आवश्यक विमर्श का बिन्दु है इस पर आपके विचार का आह्वान करता हूं।
इस दिशा में हुये एक दशक के परिवर्तनो का मै साक्षी हूं, कैसे भारत को ख्रीस्त साम्राज्य बनाने के षड्यन्त्र हुये है उसको नजदीक से देखा है चर्चा बढेगी तो खुलासा भी होगा।
सोमवार, 8 मार्च 2010
दैनिक जीवन में वास्तुशास्त्र
दैनिक जीवन में वास्तुशास्त्र
डा. रजनीश कुमार शुक्ल
वास्तु शास्त्र गृह निर्माण की कला को कहते हैं, यह एक शास्त्र है और ऐसा शास्त्र है जो हमें, गृह में रहने के लिए उपयुक्त उर्जा ,सकारात्मक वायु , स्वक्ष जल, आकाश , और वो भूमि खंड जहा हमें निवास करना चाहिए का ज्ञान प्रदान करता है । इन पांचो तत्त्वों का जिस भवन में परिपूर्ण समावेश हो वह स्थान वास्तु के दृष्टि से अति उत्तम माना जाता है । वास्तु एक ऐसी कला है जो भवन निर्माण के लिए उपयोग की जाती है । अगर वास्तु का इतिहास अगर देखा जाए तो त्रेता युग में लंका हो या द्वापर में इन्द्रप्रस्थ या हस्तिनापुर या खुद भगवान् कृष्ण के लिए द्वारका का निर्माण हो वास्तुविदों द्वारा ही किया गया था। उसके बाद की वास्तु कला का नमूना देखे तो चाहे मुग़ल हो या बौद्ध स्थापत्य हो या राजस्थान के भवन या रोमन कला अर्थात अंग्रेजो की भवन कला सर्वत्र वास्तु का महत्त्व देखा जा सकता है।
पर सामान्य मनुष्य वास्तु के हिसाब से ही भवन क्यों बनाये। मनुष्य के जीवन पर इसका आखिर क्या प्रभाव पड़ता है ? इस प्रश्न का विवेचन आवश्यक है यद्यपि इस का उत्तर अत्यन्त सरल तथा सबको ज्ञात है, मानव शरीर पांच तत्वों से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, अंतरिक्ष से निर्मित है और प्रकृति भी इन पांच तत्वों का समग्र योग है।
एक मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए वायु, जल, सूर्य की रौशनी, खुला आसमान, अग्नि और भूमि का एक टुकडा चाहिए।वास्तुशास्त्र भवन निर्माण में प्रकृति के पांच प्राकृतिक बलों या तत्वों के साथ हमारे शरीर के पांच तत्वों के तालमेल का ज्ञान है।
वास्तु से हमें दिशा का ज्ञान प्रदान करता है अर्थात यह कि कौन की दिशा हमारे लिए कितनी अच्छी है और क्यों है ? हम सब जानते हैं कि किसी भी मनुष्य के जीवन पर सूर्य के प्रकाश का प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण होता है लेकिन सूर्य की रोशनी किस दिशा में हमें क्या प्रभाव देगी ? अगर उसके ऋणात्मक प्रभाव प्रभाव हैं तो वे कैसे समाप्त हो और ऊर्जा का सकारात्मक प्रभाव कैसे प्राप्त किया जाए आदि प्रश्न अत्यन्त महत्त्व के हैं। सूर्य पूर्व से उदय होते हैं और पूर्व से दक्षिण की यात्रा करते हुए पश्चिम में जा कर उनका प्रकाश अस्त होता है तथा पश्चिम से उत्तर होते हुए पूर्व में फिर उदयमान होता है। सूर्य उत्तरायण से दक्षिणायन और दक्षिणायन से उत्तरायण की यात्रा करते हुए वर्ष भर में १२ राशियों की परिक्रमा करते है सूर्य के इस यात्रा के प्रभाव से ही ऋतुओ का आगमन होता है जिसका प्रभाव मनुष्य पर प्रत्यक्षतः पड़ता है
दिशा के हिसाब से पूरब व पश्चिम की दिशा को अत्ति महत्वपूर्ण माना जाता है । उत्तर और दक्षिण की दिशा का महत्व धरती के उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवो के प्रभाव से सम्बन्धित है ,उत्तरी ध्रुव से चुम्बकीय किरणे दक्षिण ध्रुव की और जाती है और इन किरणों का प्रभाव हम पर पड़ता है तथा ये सूर्य के प्रभाव के भांति ही लाभप्रद होती हैं । वास्तु शास्त्र इस उर्जा से लाभ उठाने के लिए उचित व्यवस्था वाला भवन निर्माण का निर्देश देता है ।
वास्तु में सबसे महत्वपूर्ण है दिशा जैसे : पूर्व(सूर्य), पश्चिम(शनि), उत्तर (बुध) ,दक्षिण (मंगल), दक्षिण पूर्व या आग्नेय कोण (शुक्र ) ,दक्षिण पश्चिम या नैऋत्य कोण ( राहू), उत्तर पश्चिम या वायव्य कोण ( चंद्रमा ), उत्तर पूर्व अर्थात ईशान कोण ( गुरु )। इन आठ दिशाओं का वास्तु में अत्यधिक महत्व है। दिशा चयन तथा चयनित दिशा के अनुसार भवन निर्माण को वास्तु कला माना जाता है। दिशा के स्वामी अपने गुण स्वभाव के अनुसार ही प्रभाव डालते है और स्वस्थ जीवन, सुखमय जीवन के लिए इन रहस्य को समझना बहुत जरूरी है । तथा यह जानकारी हमें वास्तु शास्त्र से ही प्राप्त हो सकता है
वास्तु शास्त्र की रचना मानव जीवन को सुखमय बनाने के उद्देश्य से की गयी है। सुखमय जीवन की सबसे बड़ी धुरी है अर्थ। अर्थागम के लिए ही मनुष्य व्यवसाय करता है। किसी भी व्यवसाय के मूल में मानव का अर्थ चिन्तन ही होता है। आज व्यवसाय प्रबन्धक भी मानव संसाधन के महत्व को समझने लगे हैं। समुचित तथा योग्य टीम सही वातावरण तथा उचित साधनों के माध्यम से किसी भी कार्य को सही तरीके से अंजाम देने में सक्षम होती है। समझदार व्यवसायी हमेशा सही टीम की खोज में रहता है। किंतु टीम को आकर्षित करने के लिए एक अच्छा वास्तु वातावरण सदैव उपयोगी रहता है। इस कार्य के लिए सही वास्तु वातावरण वह स्थान दे सकता है जहां की कास्मिक, ग्लोबल तथा टेल्युरिक तीनों प्रकार की ऊर्जायें अच्छी हों, संतुलित हों। कास्मिक ऊर्जा जहां सही निर्णय लेने की क्षमता देती है जो कि सही चुनाव करने के लिये आवश्यक है। वहीं ग्लोबल ऊर्जा में विशिष्ट आकर्षण शक्ति होती है। यह आकर्षण शक्ति अधिक से अधिक लोंगो को स्थान विशेष की ओर आकर्षित करती है। यह ऊर्जा जहां होती है वहां का माहौल खुशहाल और भरा-पूरा रहता है, लोंगो का उत्साह बढ़ता है। भवन की ऊर्जाओं को संतुलित करने के लिए कुछ अन्य वैज्ञानिक वास्तु के नियम भी आवश्यक है, जैसे कार्य करने वाले के बैठने की दिशा तथा स्थान विशेष में प्रयोग किये गये रंग। सामान्यतः पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठना विद्याध्यन, रिसर्च कार्य तथा ईमानदारी पूर्वक किये जाने वाले कार्यों के लिये उपयोगी है। उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठना मैनिपुलेशन के कार्यों के लिये उपयोगी होता है। भवन अथवा कार्यस्थल की आंतरिक सज्जा इस प्रकार होनी चाहिये कि उत्तर तथा पूर्व का हिस्सा छत का हो इसके अतिरिक्त ईशान्य की तरफ स्थान का खुला होना भी सहयोगी होता है। दक्षिण पश्चिम का हिस्सा ऊँचा तथा भारी होना आवश्यक है।
ये सामान्य नियम उपयोगी तो हैं किंतु आंतरिक साज-सज्जा में प्रयोग की गयी वस्तुओं की भी अपनी ऊर्जा का भी सकारात्मक होना अति आवश्यक है, यह हमेशा याद रखना चाहिए कि नकारात्मक ऊर्जा वाली वस्तुयें भवन का पूरा आंतरिक वातावरण नष्ट कर सकती हैं।
सोमवार, 25 जनवरी 2010
वेदान्त और युवा
डा. रजनीश कुमार शुक्ल
वेदान्त चराचर जगत को एक विशिष्ट विधि से देखने की प्रणाली है। इस विश्व में चर, अचर, स्थावर जंगम जो कुछ भी है उन सब को चैतसिक प्रकाश की अभिव्यक्ति के रुप में देखना यही वेदान्त के सभी सम्प्रदायों में भाषा भेद तथा प्रतिपादन विधि के भेद के होते हुये भी मुख्य प्रतिपाद्य विषय के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। १९वीं शताब्दी के अन्त में विश्व मानचित्र पर वेदान्त को भारत के धर्म के रुप में प्रतिस्थापित किया। इस रुप उन्होने वेदान्त को उपासनामूलक धर्म से अलग हट कर एक ऐसे नीतिमूलक धर्म आचार धर्म या जीवन दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया जिसमें आनुष्ठानिकता के स्थान पर बोध तथा बोध जनित व्यवहार पर बल दिया गया।
वेदान्तीय चिन्तन के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालने पर यह नवीन युग का सूत्रपात था । आदि शंकर के बाद स्वामी विवेकानन्द वे दूसरे काषाय वेशधारी सन्यासी हैं जिन्होने वेदान्त को जीवन के चतुर्थ चरण में स्वाध्याय का विषय न मान कर सभी जीवनावस्थाओं में तथा वैयक्तिक जीवन से लेकर समस्त समाज के जीवनान्तरण (Transformation) की प्रणाली के रूप में सशक्त तथा युक्तियुक्त प्रतिपादन किया है। वेदान्त जो लम्बे समय से गिरि कन्दरा तथा गहन गुफाओं मे बन्द हो कर कुछ विशिष्ट साधकों की साधना की सामग्री हो कर रह गया था उसे वहाँ से बाहर लाकर सर्व समाज की वस्तु बनाने का उन्होने अद्भुत पराक्रम किया। गीता के स्वाध्याय से लेकर फुटबाल के खेल तक सर्वत्र वेदान्त बोध के अवकाश की प्रतिस्थापना एवं एक प्रकार की चिन्मयता के अवाप्ति का उपदेश करते हुये स्वामी विवेकानन्द ने इसे मात्र मोक्षकामियों के लिये उपयोगी दर्शन के रुप में न सीमित करते हुए जीवन के हर क्षेत्र में कुशलता निर्माण की प्रणाली के रूप में प्रस्तुत किया। इसको स्वामी जी ने एक अभियान के तौर पर चलाया और कालान्तर में अनेक विचारकों ने अकादमिक तथा गैर अकादमिक सभी तरीक़ों से व्यवहारिक जीवन प्रणाली अथवा विज्ञान के युग के धर्म के रूप में प्रतिष्ठित करने के बहुविध प्रयत्न किये।
इस महनीय प्रयास में योगदान करने वाले विचारकों दार्शनिकों तथा सन्यासियों की एक लम्बी श्रृंखला देखी जा सकती है। किन्तु बीसवीं शताब्दी में जिस व्यक्ति ने वेदान्त को विश्व धर्म के रूप में प्रस्तुत करके अध्यात्म तथा विज्ञान के बीच के कथित अन्तर को समाप्त करने की दिशा में सर्वाधिक योगदान दिया है उस महान व्यक्ति का नाम स्वामी चिन्मयानन्द है। स्वामी जी ने वेदान्त को युवाओं के युग ध्रर्म के रूप में प्रस्तुत किया, किसी भी समकालीन विचारक के प्रयासों की आलोचना किये बिना, पूर्ववर्ती वेदान्त विचारकों के योगदान को स्वीकार करते हुये, भगवद् गीता के अध्ययन से वेदान्त को विश्व-धर्म बनाने की संभावना को प्रस्तुत करते हुये उसे बहुतर विस्तीर्ण करने का जो अभिनव कार्य स्वामी चिन्मयानन्द ने किया है वह अविस्मरणीय एवं सर्वविध अनुकरणीय़ है।
वेदान्त जीवन के उत्तरार्ध का धर्म नहीं है अपितु यह जीवन की प्रत्येक अवस्था के जीवन संघर्ष में सकारात्मक परिणाम लाने की अनुष्ठान विधि है, इस भाव भूमि को स्वामी विवेकानन्द ने विश्व पटल पर पहली बार प्रतिस्थापित किया तो स्वामी चिन्मयानन्द और चिन्मय मिशन ने इस अवधारणा को बहुशः विस्तारित, पोषित और पल्लवित किया है। आज किसी को भी वेदान्तीय जीवन प्रणाली का परिचय कराने की आवश्यकता नहीं है। समस्त विश्व में इसकी सहज स्वीकृति बनी है। इस सहज स्वीकृति के पीछे जिन महान व्यक्तियों का योगदान है उनमें स्वामी चिन्मयानन्द अनन्यतम हैं, अनितर असाधारण तथा लोकोत्तर हैं।
वेदान्त युवाओं में किस रूप में उपयोगी हो सकता है इसकी समीक्षा के लिये स्वामी जी के चिन्तन का ही उपयोग किया है अथवा यह भी कहा जा सकता है कि मैं ने उसी रूप में वेदान्त को युवजन के लिये लाभकारी होना स्वीकार किया है। वेदान्त की बहूपयोगिता को स्वामी जी ने दिसम्बर १९९२ में संयुक्त राष्ट्र संघ को सम्बोधित करते हुये युक्ति-युक्त रूप से सिद्ध किया है। इस व्याख्यान के द्वारा स्वामी जी ने बिना स्व के गौरव गान के ही अत्यन्त सुष्ठु रीति से यह प्रतिपादित किया है कि आज की समस्याओं के समाधान का एक मात्र रास्ता भारत की वेदान्त दृष्टि ही है।
आज सम्पूर्ण पृथ्वी गहरे संकट में है, समूचे ग्रह का अस्तित्त्व ही संकटापन्न है। राष्ट्रों के बीच युद्ध, सभ्यताओं के संघर्ष ने समस्त मानव जाति को अस्तित्त्वपरक गहन संकट में डाल दिया है। अन्ध-धार्मिकता के प्रति विद्रोह के फलस्वरूप विकसित आधुनिक सभ्यता ने क्षिति, जल पावक गगन समीर इन पांचों ही तत्त्वो को दूषित कर दिया है। परिणामतः यह कह पाना कठिन है कि यह धरती कब तक बनी बची रहेगी। मनुष्य ने प्रकृति पर विजय पाने की अपनी अदम्य लालसा के चलते प्रकृति के मूल स्वरूप में जिस प्रकार की छेड़-छाड़ की है जैसा भयावह हस्तक्षेप किया है उसका फल यह है कि प्राकृतिक साम्य समाप्त हो गया है । धरती विक्षुब्ध हो गयी है आज यह कहना बेमानी हो गया है कि ’माताभूमिः पुत्रोsहम पृथव्याः’। यह संकट जीवन प्रणाली के द्वारा उत्पन्न हुआ संकट है। आधुनिक जीवन प्रणाली मनुष्य तथा अन्य जीवधारी एवं जड़ प्रकृति को विविक्त रुप में देखने की प्रणाली है। यह कथित आधुनिक प्रणाली पश्चिम में सांस्थानिक धर्म के विरोध में विकसित हुई थी। यद्यपि कि शक्तिशाली धर्माम्नाय के विरूद्ध हुये इस विद्रोह को पश्चिम ने कभी भी सामी मूल के खिलाफ विद्रोह न कहते हुए इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के परिणाम स्वरूप उपजी हुई जीवन प्रणाली कहा है। अब यह अलग विचार का विषय है कि यह कथित पश्चिमी आधुनिक जीवन प्रणाली कितनी वैज्ञानिक है?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper) ऐसा शब्द है जिसकी बहुविध परिभाषा हो सकती है किन्तु एक तो परिभाषा सब को स्वीकार करनी होगी वह यह कि जो चिन्तन प्रणाली न्यूनतम प्राक्कल्पना के आधार पर युक्ति-युक्त रूप से प्रतिपादित हो सके, स्थूल से सूक्ष्म की ओर अन्तरण का सरलतम तरीक़ा हो वही अपेक्षया अधिक वैज्ञानिक विधि हैं। जब विश्व की कोई व्याख्या सहज एवं सरलतर होती है तो कालजयी वैज्ञानिक सिद्धान्त के रूप में उसे स्वाभाविक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। आज हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं उसमें सूक्ष्म किन्तु जटिल की अवधारणा को विज्ञान के विकास के निदर्श के रुप में स्वीकार कर लिया गया है। वस्तुतः वाह्यार्थवादी विज्ञानों का यह यह स्वाभाविक परिणाम भी है। वर्तमान सभ्यता इस प्रकार के वस्तुवादी विज्ञान( Object-centric Science) का ही परिणाम है| इस वस्तुपरक विज्ञान में दो प्रकार के तर्कशास्त्र प्रयुक्त होते है एक वह जो मध्य पद के परिहार के नियम ( Low of excluded middle) पर चलता है दूसरा जो सादृश्य के संग्रह पर आधारित है। भेद और समता के तर्कशास्त्र पर आधारित इस विज्ञान ने न केवल मनुष्य के लिये सुविधामय जीवन के उपकरण जुटाये हैं अपितु एक प्रकार कि संस्कृति का भी निर्माण किया है यह संस्कृति वाह्य जगत के संश्लेषण तथा विश्लेषण पर आधारित है। यह सब कुछ वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित संस्कृति के निर्माण से मनुष्य के जीवन को आनन्दमय बनाने के नाम पर हुआ है। क्या इस समस्त प्रयास का परिणाम मनुष्य का आनन्द है? इस प्रश्न का उत्तर कठिन है सच तो यह है कि आज विश्व का कोई ऐसा कोना नहीं है जहां संत्रास न हो व्यक्ति इस काल खण्ड में संत्रस्त होने के लिये अभिशप्त है।
इस मानवीय अभिशप्तता का विस्तार विकास के नाम पर हुआ है। विकास का यह सभ्यता केन्द्रित ढांचा मनुष्य के आन्तरिक विकास को कर पाने में अक्षम है क्योंकि इस वैज्ञानिक सभ्यता की निर्मिति ही जिस विज्ञान पर हुई है वह वाह्यार्थ पर केन्द्रित है। अथवा यह कहा जाय कि जो अर्थ वाह्य जगत में प्राप्त नहीं हैं उन सबकी निरर्थकता का डिंडिम घोष यह संस्कृति है। इस सभ्यतामूलक सांस्कृतिक अवधारणा से परिवृत जगत में ही हमें जीवन जीना है यह हमारी अस्तित्त्वात्मक बाध्यता है। इस अस्तित्त्वात्मक बाध्यता के बीच जीवन को सर्वाड्गीण बनाने की विद्या का नाम वेदान्त है। स्वामी विवेकानन्द तथा स्वामी चिन्मयानन्द ने वेदान्त को सभी प्रकार की सभ्यताओं में मूल्याधिष्टित सांस्कृतिक जीवन की विधि के रूप में ही प्रस्तुत किया है।
अब यह प्रश्न विचारणीय है कि आज के युवा के लिये वेदान्त की उपयोगिता क्या है? अर्थात मोक्ष शास्त्र नामक इस विद्या प्रस्थान का आज के युवा के लिये क्या महत्त्व है? अथवा यह कि निवृत्तिमूलक शास्त्र की प्रवृत्ति प्रधान जीवन काल में कोई उपादेयता है अथवा नहीं? इस दिशा में द्वितीय विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या वेदान्त विद्या के विकास में युवाओं की कोई भूमिका है? क्या युवा मन युवा शरीर वेदान्त नामक निवृत्ति नय का पथिक या पथ निर्माता हो सकता है? इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के अतिरिक्त यह भी अत्यन्त महत्त्व का प्रश्न है कि क्या सूचना एवं तकनीक के इस युग के युवाओं की दुनियांवी समस्याओं के समाधान की दिशा में वेदान्त विद्या स्थान की कोई उपयोगिता है अथवा नहीं ?
स्वाभाविक तौर पर मैं सबसे पहले युवा के लिये वेदान्त की आवश्यकता पर विचार करना चाहता हूं। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस प्रश्न के उत्तर की तलाश में मैं किसी काल खण्ड विशेष के युवा की चर्चा किये बिना जीवन के यौवन काल में वेदान्त की अपरिहार्यता पर अपने विवेचन को केन्द्रित रखना चाहूंगा। इस रुप में युवावस्था को विवेचित करने पर सहज ही ध्यान में आता है कि यह अवस्था जीवन का ऐसा काल खण्ड है जो विशिष्ट प्रकार की मानसिकता का निर्माण करता है। जिस के प्रमुख लक्षण है- जो कुछ स्थापित व्यवस्था है उससे विद्रोह, जीवन या जगत में जो कुछ जड़ गतिहीन या ठहरा हुआ दिखता है। उसे तोड कर आगे बढ़ना, विपरीत स्थिति को अपने अनुसार अनुकूलित करने की अदम्य प्रवृत्ति का नाम युवावस्था है। इस उद्दाम शक्ति को सगुण रुप से क्रियाशील रखने की विधि युवावस्था में वेदान्त की उपयोगिता को सिद्ध ही नहीं करता है उसे अत्यन्त आवश्यक तथा अपरिहार्य भी बना देता है। भगवद् गीता इसको अत्यन्त सशक्त तथा युक्तियुक्त दंग से प्रस्तावित करती है। कर्त्ता होना मनुष्य की जन्मजात स्थिति है बिना कर्म किये कोई एक क्षण भी स्थित नही रह सकता है। यौवन कर्म की शिखरावस्था है इस लिये इस अवस्था में कर्म-विकर्म सभी का निश्चित रुप से सम्पादन होता है। किन्तु कर्म करते हुये नैष्कर्म्य की सिद्धि मनुष्य के कर्म जनित दु:ख को कम करते हुये उसके सक्रिय जीवन के आनन्द को बढ़ाता है। प्रत्येक व्यक्ति कुछ भी इसलिए करता है कि उसे वह करने में आनन्द आता है। इस आनन्द को निरतिशय करने की प्रणाली ही वेदान्त है।
कर्म फ़ल उत्पन्न करते है, फ़ल का क्षय भोग से होता है इस लिये भोग कर्म फ़ल के बन्धन में बाँधता है अतः यह जिज्ञासा तो स्वाभाविक है कि कर्म या प्रवृत्ति के पथ पर आनन्द कैसे प्राप्त हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर भगवद्गीता है। मैं बार-बार भगवद्गीता की चर्चा कर रहा हूँ तो इस लिए कि वेदान्त किसी विशिष्ट चिन्तन सरणि का नाम नही है अपितु वेदान्त उपनिषदç विद्या को ही कह्ते है(वेदान्तो नाम उपनिषद प्रमाण:)। सभी कोशकार वेदान्त शब्द का अर्थ उपनिषदç या रहस्य करते है। भगवद्गीता के सम्बन्ध में तो विश्व्ख्याति है_
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दन:।
पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महतç॥
भगवद्èगीता मात्र इस लिये महत्त्वपूर्ण नहीं है कि यह ईश्वरीय वाणी है अपितु इसलिये श्रेष्ठ है कि इस में ईश्वर की प्राप्ति का सभी संभव उपाय प्रतिपादित है\ लेकिन ईश्वरीय वाणी होने मात्र से ही गीता सब के लिये उपादेय नही है यह उपादेय है तो इसलिये कि इसमें प्रति प्रश्न हैं। गीताकार तो ईश्वर प्राप्ति के सहज साधन के रुप में परिप्रश्न को साधन के रूप में स्वीकार करते हैं। प्रश्न करने कि इतनी छूट अपने आप में इस विद्या स्थान को विश्व धर्म बनाने के लिये पर्याप्त है।
वस्तुतः वेदान्त परलोक के चिन्तन पर आधारित जीवन प्रणाली नहीं है अपितु यह इस विश्व के संबन्ध मे किया गया चिन्तन है। गीता के प्रश्न जो समूचे वेदान्त का हार्द प्रस्तुत करता है जीवन के दैनिक समस्याओं से जुडे प्रश्न हैं। नचिकेता जब अपने पिता से चिल्लाकर पूछता है कि आप को बताना होगा कि आप मुझे किस को दे रहे हैं तो यह प्रश्न पारलौकिक नहीं है इस विश्व की नैतिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ नितान्त लौकिक प्रश्न है, जब नारद सनक सनन्दन सनत्कुमार से यह कहते है कि मै मन्त्रविदç हूँ आत्मविदç नहीं तो यह प्रश्न शान्ति की तलाश में व्याकुल एक विद्वान के स्वाभाविक प्रश्न हैं, किसी पारलौकिक सत्ता के लिये आकुल व्याकुल रहस्यवादी के प्रश्न नहीं हैं। अतः यह तो स्पष्ट ही है कि वेदान्त का उद्भव और विकास नितान्त लौकिक किन्तु आध्यात्मिक प्रश्नों के समाधान के लिये हुआ है। यह जगतç से पलायन का दर्शन न हो कर जगतç के मूल रुप को समझते हुये उचित व्यवहार का जीवन-विद्या पथ है।
इस को भगवद्गीता के विषाद योग नामक प्रथम अध्याय से समझा जा सकता है। इस अध्याय में अर्जुन की स्थिति किसी भी समकालीन युवा के स्मान ही है। उसके प्रश्न प्राचीन मूल्य व्यवस्था तथा नवीन वैश्विक परिस्थिति के साथ जूझ रहे किसी भी युवा के स्वाभाविक प्रश्न हैं। गीता प्राचीन व्यवस्था तथा नवीन चुनौतियों का समुचित उत्तर है। प्राचीन मूल्यों के प्रति आस्क्त अर्जुन प्राचीन मूल्यों परंपराओं एवं कुल धर्म की रक्षा के लिये युद्ध के नियत कर्म से भाग जाना चाहता है उसने अपने लिये नियत कर्म के फलों की निःसारता प्रतिपादित करते हुए कहा कि ---
नकाड्.क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन् गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन् वा॥
प्रथम दृष्टया यह त्याग लगता है लेकिन यह वैराग्य जनित त्याग न हो कर गहरे शोक के क्षणों में उत्पन्न होने वाली त्यागवृत्ति है। अर्जुन विजय, राज्य, सुख सब कुछ अपने संबन्धियों के लिये चाहता है । पर जब उसे यह दिखायी देता है कि सभी अपने प्राण का मोह त्याग कर युद्ध भूमि में आ गये हैं और ऐसी स्थिति में विजय तो इन को मार कर ही होनी है फिर कौन होगा विजयोपरान्त प्राप्त राज्य का भोक्ता ?
इस प्रश्न के साथ ही अर्जुन के समक्ष एक और विकट प्रश्न है वह है सामाजिक रूढि तथा परंपरागत नैतिकता के उल्लंघन का । वह एक ऐसा व्यक्ति है जो समाज और परंपरा के आधार पर चलना चाहता है। अपने वैयक्तिक सत्यानुभुतियों को आधार बना कर नहीं। कृष्ण का उपदेश कथित नैतिकता के वाह्य बंधनों को अस्वीकार कर आन्तरिक अनुभव एवं शक्ति के विकास का मार्ग है। जीवन का यथार्थ दो संसारों के सीमान्त पर विद्यमान है। युवावस्था में यह संघर्ष और अधिक कठिन हो जाता है। क्योंकि इस आयुखण्ड में व्यक्ति कुछ करने का प्रयास तो करता है पर वह एक अव्याख्येय निर्णय विहीनता की स्थिति में फंसने लगता है। इस काल खण्ड में न तो अपने आप को जानता है न तो अपने साथियों को ही जानता है और न ही वह विश्व की वास्तविक स्थिति तथा प्रकृति को ही जान पाता है। विश्व के दुरçदम्य संघर्ष में उसे जिस रूप में खड़ा होना पड़ता है उस प्रकार की स्थिति में पलायन करने का मानस बना स्वाभाविक तथा अवश्यंभावी है। अर्जुन इन्ही कारणों से युद्ध भूमि को छोड़ना चाहता है। अर्जुन की स्थिति हर युवा की है, युवा सामान्यतः जीवन के युद्ध से घबराता नहीं है लेकिन विजय के लौकिक रास्ते को वह उचित नहीं मानता है । लौकिक रास्ता अर्थात् सत्य और अनृत् के युग्म से निर्मिति नैसर्गिक रास्ता । परिणामतः कार्पण्यता से घिर जाता है। वेदान्त इस स्थिति में स्वाभिमान पूर्वक कर्म के लिये प्रचोदित करने का नय है। कर्त्तव्य पथ पर अनुकुल परिणाम की कामना के बिना कर्म संपादन को ही जीवन लक्ष्य मान कर कार्य में प्रवृत्त होने की प्रेरणा इसी नय वीथि से प्राप्त होती है। इतना ही नहीं यह जीवन में अनायास प्राप्त होने वाले प्रत्येक संत्रास का समुचित प्रत्युत्तर है। यह विषय वासना से मन को हटा कर सर्वॊच्च शुभ तक अनथक अनवरत चलते रहने की प्रेरणा है।
इस वेदान्त वीथि पर युवा ही चल सकता है इसी कारण से यह हर युग के युवा का ध्रर्म है। उपनिषदों के नायक नचिकेता, उद्दालक, श्वेतकेतु, सत्यकाम था आरूणि आदि सबके सब युवा हैं युवा मन ही सपने सजाता है सपनो को सच करने साकार करने और अन्तिम परिणाम तक पहुँचाने की युयुत्सा रखता है कर्तृत्त्वाभिमान से विरत रहते हुए नियत कर्मों को निश्चित परिणाम तक पहुँचाने का सामर्थ्य मात्र युवा में ही है। वेदान्त विद्या तो युवा जनों की ही विद्या है। नचिकेता से आरूणि तक सभी मन्त्र द्रष्टा ऋषि युवा हैं, शंकराचार्य से विवेकानन्द तक सभी आचार्य युवा हैं। इस प्रकार के युवजन सम्मत दर्शन प्रस्थान , युवकोचित धर्म दृष्टि को युवाओं के लिये उपादेय प्रतिपादित करने का प्रयास पिष्ट पेषण मात्र है।
वेदान्त युग का धर्म है और इस युग का धर्म आनुष्ठानिक नहीं हो सकता है क्योंकि यह काल खण्ड् स्वतन्त्रता के घोष का काल खण्ड है\ समस्त बन्धनों से मुक्ति का काल खण्ड है। ऐसे काल में सांस्थानिक धर्म व्यवस्था अपने को उपादेय सिद्ध नहीं कर सकती है। जब भी वह समकालीन विश्व पटल पर अपने को स्थापित करने का प्रयास करेगी उसका जड आतंकी रुप ही सामने आयेगा क्योंकि अनुष्ठान केन्द्रित सांस्थानिक धर्म में गतिशीलता तो संभव ही नहीं है। फलतः इसमॆं व्यक्ति की निजता की रक्षा संभव नहीं है। वैयक्तिक स्वतन्त्रता की रक्षा संभव नहीं है। अतः इस् युग को एक वैचारिक धर्म की आवश्यकता है। चेतना केआरोहण की प्रणाली की आवश्यकता है। वेदान्त ही वह सोपान है जो चेतना का आरोहण करा सकता है।
वेदान्त ही इस भौतिक त्रिआयामी विश्व में चतुर्थ आयाम की संकल्पना को साकार कर सकता है। त्रिआयामी विश्व मॆं धर्म, अर्थ काम का कार्य कारण संबन्ध जनित बन्धन है। मुक्ति वह चतुर्थ आयाम है जो इनकी कार्य कारण श्रृंखला को तोडता है। कार्य कारण कर्म फल की अनादि श्रृंखला को स्थगित कर देना और कालान्तर में उसे तिरोहित कर देना ही चतुर्थ आयाम की संप्राप्ति है। यह वह स्थिति है जिसमें उपनिषदç का मन्त्र सार्थक हो उठता है कि---
तदेजति तदन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य वाह्यतः॥