मंगलवार, 10 जनवरी 2012
उत्तिष्ठत् जाग्रत प्राप्यवरानिबोधत
यह आजके युग के लिये नव वेदान्त ह। याद रहे उन्नीसवी शताबदी में स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि आने वाले पचास वर्षों तक व्यर्थ के देवी देवतओं की उपासना छोड कर केवल भारत माता की उपासना करनी चाहिये। यही एकमात्र जाग्रत देवी है औअर हमारा राष्ट्र एकमात्र उपासस्य इसका फल भारत को आजादी के रुप में मिला। आज पुनः परिस्थिति कठिन है, आत्मसम्मान के बोध के अभाव, आत्यन्तिक सुख की विस्मृति से उत्पन्न ऐन्द्रिक जीवन विधि और सुख की भौतिक व्यवस्था ने मनुष्य को साधना पथ से विपथ कर तकनीक-केन्द्रित कर दिया है। परिणामतः आज के साधारण मनुष्य ने आत्मत्याग और तप के नित्य आनन्दवर्धक पथ को छोड कर, सहज ही प्रस्तुत आयातित जीवन प्रणाली को अंगीकार कर लिया है। जिसने उसकी प्रतिरोधि शक्ति को समाप्त कर दिया है और तात्कालिक सुख की तकनीक-प्रस्तुत पद्धति को अपना जीवन दर्शन बना लिया है।
इसका स्वाभाविक परिणाम है समाज जीवन के सभी क्षेत्रों के असह्य भ्रष्टाचार। इस असह्य भ्रष्टाचार के खात्मे के बिना भारत का भला संभव नहीं है। भारत का भला इसलिये जरुरी है कि भारत नष्ट होता है तो, विश्व को प्रकाश दिखा सकने जीवन प्रणाली नष्ट हो जायेगी। भौतिक विकास और भौतिक सुख की तकनीकजनित जीवनप्रणाली ने एक मनुष्य़ को दुसरे मनुष्य के शोषक के रुप में खडा कर दिया है। परिणामतः मनुष्य मात्र के कल्याण के विचार, जिसे सर्वे भवन्तु सुखिनः के रुप में अभिव्यक्त किया गया है, आज के कलखण्ड में निरर्थक सिद्ध हो रहे हैं। ऐसे में हमें सबके कल्याण का विचार पुनः प्रतिस्थापित करना होगा पर यह किसी एक आन्दोलन से संभव न होगा किसी कानून से भी इसका समाधान नहीं है। कोई लोकपाल दिक्पाल भी इसको सर्वाभिमुखी जीवन की प्रणाली के रुप में प्रतिष्ठित नही कर सकता है। ये सब इस के साधन हैं समवेत रुप से साधन हैं। पर यह आनदोलन एक कार्यक्रम नही है, सतत् चलने वाली साधना है। इसलिये सार्वकालिक आन्दोलन के रुप में इसकी प्रतिष्ठा तो हमें करनी होगी। अभी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो आक्रोश है, वह मात्र सत्ता प्रतिष्ठान के भ्रष्टाचार के विरुद्ध है। इसे व्यक्ति के स्तर पर कुटुम्ब के स्तर पर स्थापित करने का जोशीला प्रयास करना तो सोचा भी नहीं गया है।
नचिकेता की याद इसीलिये महत्वपूर्ण है कि नचिकेता मे निर्वैयक्तिक प्रेरणा है। वह पिता के शाप से दुखी न हो कर सगुण आक्रोश से आप्लावित हो जाता है। लक्ष्य की सिद्धि के बाद तो यह आक्रोश रचनाधर्मी औदार्य से आप्लावित को जाता है। अभी जो आन्दोलन समाज में प्रचारित है इसमें युवा नहीं है ऐसा तो कोई स्वप्न में भी नहीं सोच सकता है। निसन्देह यह य्वा शक्ति काही आन्दोलन है। आन्दोलित युवा में दुख है, आक्रोश है परिवर्तन की इच्छा शक्ति भी है, परन्तु एक बडा अभाव सर्वत्र दृष्टि गोचर हो रहा है, वह निर्वैयक्तिकता का अभाव तथा रचनाधर्मी औदार्य की कमी। यह दोनो ही युद्ध के मानस से नही निर्मित किया जा सकता है। अपितु इसके तप की आवश्यकता है सृजनात्मक कल्पना की जरुरत है। वस्तुतः मूल्यों का संकट सृजनात्मक कल्पना के अभाव का संकट है। जब सृजनात्मक कल्पना अवकाश पर होती है तो मूल्यों का क्षरण तो अवश्यंभावी है। अस्मिता का पहचान का संकट भी आपतित होता है। यह सब कुछ एक नये विमर्श के साथ ही पूर्णता को प्राप्त होगा। बूढी गाये दान करने के पाप से बचाने के लिये नचिकेता विद्रोह कर बैठा था अपने पिता से, पर उसने पाप के खिलाफ ही बगावत नहीं की, वास्तविक जीवन मूल्यो को स्थापित करने के लिये साक्षात मृत्यु के देवता से भी वाद विवाद किया। यह वैदिक विद्रोह तथा विमर्श आज भी प्रासंगिक है। क्योंकि जड और भ्रष्ट व्यवस्था से विद्रोह करना ही युवा स्वभाव है। सामने चाहे जैसी भी शक्ति हो, युवा जब भी सपने सजाता है परिवर्तन का व्रत लेता है, नये युग का सृजन होता ही है।
हां यह पथ कठिन है! सब अपना जीवन सगुण सकारात्मक परिवर्तन के लिये आहुति दें यह न तो संभव है न तो अपेक्षित ही है। इस काल की अपेक्षा तो मात्र इतनी है कि युवा अपने अन्दर सकारात्मक भाव भर कर स्वयं को समकालीन युग धर्म से अलग खडा करे। शाश्वत मूल्यों को स्वीकर करता हुआ युवा कुछ नया कर दिखाये, नव नवल परिवर्तन का वाहक बने।इसके लिये भ्रष्टाचार के दानव की छाया अपने और अपने कुटुम्ब पर न पडने देने का उपक्रम करना होगा। यही युवा कृष्ण ने किया था। सबसे पहले गोकुल के अपने बांधवों और स्वयं को दानवी आतंक से मुक्त किया उसके बाद कूद गये वे वास्तविक परिवर्तन के लिये दानवी सत्ता के केन्द्र पर। यही रणनीति भ्रष्टाचार के दानव से लडने की सार्थक नीति है। तो क्षुरस्य धारा निशितादुरत्या दुर्गम पथ पर आगे बढने के लिये इसका संज्ञान और संकल्प दोनो ही आवश्यक है।
शनिवार, 23 अप्रैल 2011
शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010
किसका ग्रन्थ है गीता, कौन महत्वपूर्ण अर्जुन या कृष्ण?
आज भगवद् गीता का प्राकट्य दिवस है अतः इस दिन का विशेष महत्व है। आज के दिन मन में उठने वाले प्रश्नों में, गीता धर्मग्रन्थ है या नीतिग्रन्थ यह विश्व व्यवस्था की दार्शनिक विवेचना है अथवा रणनीति का प्रतिपादन आदि प्रश्न तो महत्वपूर्ण हैं ही, किन्तु अधिक महत्वपूर्ण है इस बात का विचार कि वह कौन है जो गीता के प्राकट्य का साधकतम कारण है? भगवान श्रीकृषण के नाते गीता है अथवा अर्जुन के नाते इसका मह्त्व है। इनमें से कौन है जो न होता तो गीता न होती?
इस संबंध में मेरा मानना है कि वह अर्जुन है जो गीता को संभव बनाता यदि अर्जुन न होता तो गीता न होती। श्रीकृष्ण तो ईश्वर हैं उनके लिये गीता का संगायन कौतुक मात्र है। किन्तु अर्जुन अर्थात नर के लिये ईश्वर से प्रश्न, प्रति प्रश्न करना सहज नहीं है। श्रीकृष्ण तो बताने के लिये ही हैं, जो जानता है उसके लिये बताना आसान है पर जो नहीं जानता है वह बेचारा क्या पूछ सकता है? बिना जाने पूछना कठिन है।
अज्ञ तो निर्भ्रान्त होता है। संशय ज्ञान की पूर्व शर्त है तो ज्ञानपूर्वक ही होने वाली घटना है, इसलिये माना जाता है कि एक ज्ञान दूसरे ज्ञान को जन्म देता है। अतः अर्जुन ही भगवद्गीता में महत्वपूर्ण है ईश्वर तथा ईश्वरीय क्षमता से युक्त लोग तो हर काल खण्ड में होते हैं जो संशयों का निवारण कर सकने में सक्षम हैं। पर ऐसा शंकालु जो ईश्वर का खौफ खाये बिना लगातार पूछता जाये दुर्लभ है। इस दुर्लभ क्षण की उपस्थिति जब भी होती है तो इतिहास बदलने वाला ज्ञान प्रकट होता है।
भगद्गीता इस कारण से ही विशिष्ट है कि इसक प्रथम श्रोता अर्जुन हैं। अर्जुन वह सधारण आदमी है जो पूछना जानता है प्रश्न खडे करना जानता है। जब प्रश्न खडे होते हैं तो जानने वाले को बताना ही पडता है। इस बताने की प्रक्रिया का नाम ही गीता है। यह किसी एक मत पन्थ का ग्रन्थ नहीं है समूची मानव जाति का ग्रन्थ है। इसमें अर्जुन है, प्रश्नकर्ता अर्जुन है इसलिये यह पान्थिक धर्मग्रन्थ न हो कर समस्त मानव जाति का ग्रन्थ है।
यह अर्जुन के कारण ही हो सका है, अर्जुन पूछता गया भगवान को बताना पडा। भगवान तो सर्वज्ञ है सभी रास्ते जान्नते है पर सभी रास्ते गीता में ही दिखतें हैं और कहीं नहीं। तो मातर् इसलिये कि गीता में ही अर्जुन है अन्य धर्मग्रन्थों में अर्जुन नहीं है। आज गीता जयन्ती का परम पावन दिन अर्जुन सा संशय वाले मन का होने का बनने का सत्संकल्प लेने का दिन है।
गुरुवार, 16 दिसंबर 2010
छात्र आन्दोलन की प्रासंगिकता सार्वकालिक है।
जो समाज यथास्थितिवादी नहीं है,सपने देखता है और सपनो को सच करने के लिये प्रयास करता है उस समाज में छात्र युवा आन्दोलन अपरिहार्य है। भारत का समाज स्वाभाविक रुप में ऐसा ही है। भारत की प्रगति समृद्धि तथा विश्वविजय की ओर बढ़ रही अप्रतिहत गति युवा गतिशीलता का ही परिणाम है। इस गतिशील विकास को समझने के लिये नब्बे के दशक के बाद की सामाजिक अभिवृत्ति को विश्लेषित करने एवं मूल्यांकित करने की आवश्यकता है। छात्र आन्दोलन को समाप्त करने तथा छात्र सक्रियता को स्तंभित करने के कारण भारत में किस प्रकार की समस्यायें आयी है इसका भी विवेचन आवश्यक है।
यदि भारतीय सन्दर्भों में छात्र सक्रियता का मूल्याकंन तथा उसकी प्रासंगिकता का विचार सही सन्दर्भों में करना है तो इसे मात्र सत्ता परिवर्तन के राजनीतिक साधन के रुप में देखने की सामान्य प्रवृत्ति से अलग सोचने की आवश्यकता भी है क्योंकि सत्ता परिवर्तन और राजसत्ता दखल के आन्दोलन वास्तविक छात्र युवा आन्दोलन नहीं हैं, अपितु यह राजनीतिज्ञों के द्वारा अपने दलीय हितो को लेकर किया जाने वाला उपक्रम मात्र है। अतः उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह द्वारा अथवा देश मॆ राहुल गांधी द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रमों को छात्र युवा आन्दोलन के पर्याय के रूप में देखना स्थिति का वास्तविक दर्शन नहीं है। इसका निहितार्थ तो छात्र युवा आन्दोलन को अप्रासंगिक सिद्ध करना ही है।
इसी प्रकार युवा आन्दोलन के दिन बीत गये इस प्रकार की भविष्यवाणी करने वाले लोग १९९० के बाद के उदारीकरण तथा तज्जन्य उपभोक्तावाद के अधिवक्ता एवं सृजनात्मक कल्पना से शून्य लोग हैं। उनके द्वारा परोसे जा रहे तथ्य इस देश के युवा मन का यथार्थ नहीं है। इसलिये यह आवश्यक है कि भारत के युवा का सच सामने आना चाहिये। उसे प्रचारित प्रसारित करने का बहुशः यत्न भी होना चाहिये। किन्तु भारतीय युवा का समकालीन रुप बाजार के विस्तार में सहायक नहीं है अतः इस को बाजार केन्द्रित विचार सरणि में स्थान नहीं प्राप्त हो सकता है। इन सब के होते हुये यह भी सच है कि समकालीन समाज का नियन्त्रण बाजार द्वारा हो रहा है न कि समाज में अनुकरण योग्य आदर्श प्रस्तुत कर सकने की क्षमता रखने वाले व्यक्तित्व वाले श्रेष्ठ जनों के द्वारा।
आज आवश्यक है कि स्वातन्त्र्योत्तर भारत में छात्र युवा आन्दोलन के महत्त्व तथा उसकी प्रभावकारी भूमिका का स्मरण किया जाय तथा १९९० के बाद की छात्र युवा गतिविधियों का समुचित मूल्यांकन हो। इसके बिना भारत में छात्र आन्दोलन की प्रासंगिकता का निषेध उचित नहीं है। सत्य तो यह है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति से अब तक का समकालीन इतिहास समर्थ, सशक्त और वैभवशाली भारत के निर्माण में अपना श्रेष्ठतम योगदान करने वाले छात्र आन्दोलन का ही इतिहास है। याद करें स्वतन्त्रता के बाद जब देश के संविधान निर्माण पर सामाजिक जीवन में चुप्पी थी, सन्नाटा पसरा हुआ था। संविधान सभा के बाहर देश की जनता को उसके स्वरुप तथा रचना के संबन्ध में बताने वाला कोई न था। तब इस देश के युवाओं ने रचनात्मक संघर्ष का व्रत लिया और भारतीयकरण उद्योग के नाम से एक छात्र आन्दोलन खडा हुआ। १९६२ मॆं चीन के आक्रमण के बाद पूर्वोत्तर की सीमा के मानवीय प्रश्न जिसे नक्शों और ग्रन्थों के आधार पर सुलझा या जाना संभव न था उसके लिये हृदय से संवाद करनॆ वाले मानवीय संवेदना से युक्त प्रयासो की आवश्यकता थी यह स्थिति राष्ट्रीय परिदृष्य में चुप्पी की बन गयी थी। इस मौन को तोडने के लिये पूर्वोत्तर के लोगों से मिलकार हृदयपूर्वक संवाद स्थापित करने के लिये अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जब अन्तर्राष्ट्रिय छात्र जीवन दर्शन नाम प्रकल्प की शुरुआत की तो यह भारत के इतिहास में अनूठी घटना थी। यह रचनात्मक छात्र आन्दोलन की अनोखी पहल थी, इसने देश के उपेक्षित भूभाग के लोगों से हृदय से संवाद तथा समस्त भारत के साथ पूर्वोत्तर के युवाओं के समरस संवाद का जो वितान प्रस्तुत किया है वह किसी भी शासकीय प्रयास से संभव न था। यह सब युवा रचनाधर्मिता से ही संभव था और उसने कर दिखाया। १९७४ का छात्र आन्दोलन किस प्रकार दूसरी आजादी का आन्दोलन बना और लोकतन्त्र की समाप्ति के षडयन्त्र को अपने अदम्य पराक्रम से नेस्तनाबूँद कर छात्र शक्ति ने सामजिक दण्ड शक्ति की अपनी भूमिका को जिस यशस्विता के साथ सिद्ध किया वह इतिहास का विषय है।उस पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि अब बहुत कुछ कहने की आवश्यकत नही है।
इस आलेख में मैं इस पर केन्द्रित हूँ कि वर्ष ७७ के बाद भी छात्र आन्दोलन मरा नहीं है अप्रासंगिक नही हुआ है। कश्मीर की समस्या आज पूरे देश मे अपने वास्तविक एवं यथार्थ रुप मे जानी जा रही है तो यह देश के युवाओं के द्वारा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेतृत्व में चलाये गये आन्दोलन का ही परिणाम है।असम सहित समूचे भारत में घुसपैठ यदि केन्द्रिय समस्या बना है,लोगों की चिन्ता इस बात को लेकर घनीभूत हुयी है तो इसका श्रेय परिषद के नेतॄत्व में पले छात्र आन्दोलन को ही है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध १९८६-९० का संघर्ष हो अथवा कश्मीर की समस्या छात्र सक्रियता का ही परिणाम था कि इस पर समस्त समाज गंभीर हुआ। नब्बे के बाद अर्थात् वैश्विकता की कथित आंधी और उदारीकरण के व्यापारिक उपक्रम के साथ ही यह बात जोर-शोर से कही जने लगी कि छात्र आन्दोलन के दिन लद गये ।शायद इस लिये कि छात्र आन्दोलन को परिभाषित करने वाले इसे सत्ता परिवर्तन का माध्यम मानते है। चूंकि व्यापारीकरण बाजारीकरण के वैश्विक प्रयास में सरकरों की प्रासंगिकता ही समाप्त हो गयी । इसलिए छात्र आन्दोलन की भी निरर्थकता सिद्ध हो गयी है।किन्तु यह योजनबद्ध विभ्रम का निर्माण मात्र था। समस्त विश्व विशेषत: भारत में छात्र आन्दोलन सत्ता परिवर्तन का साधन नही रहा है। सत्ता परिवर्तन आन्दोलन का साधन अवश्य रहा है।वस्तुत: आन्दोलन तो हमेशा राष्ट्रिय सन्दर्भों में ही खडे हुए किन्तु सत्ता परिवर्तन के पडाव पर आते-आते उन आन्दोलनों ने दम तोड दिया । इसलिए राजनीति द्वारा व्यर्थ एवं अप्रासंगिक कहे जाने लगे।
१९९० से २००० के बीच के दस वर्ष तो इस देश में छात्र आन्दोलन के लिए अत्यन्त खराब रहे है क्योंकि वैश्विक व्यापारवाद के समर्थकों ने छात्र सक्रियता के खिलाफ़ बौद्धिक मुहिम चलायी और उसे सर्वथा अप्रासंगिक सिद्ध कर दिया ।इस काल खण्ड में विखण्डनवाद ,व्यक्तिवाद ,वैयक्तिक नीजता आदि जाने कितने प्रकार के सिद्धान्त गढे गये और उन तर्कों के आधार पर सामूहिक सक्रियता कि निस्सारता सिद्ध की जाने लगी। जिसका परिणाम हुआ कि राज सत्ता ने छात्रों की सक्रियता के सभी मंचों को प्रतिबन्धित करना, उपेक्षित करना प्रारंभ कर दिया। इसका निशाना छात्र संघ बने।
इस प्रयास ने दोधारी तलवार का काम किया। एक तरफ़ तो यह सिद्ध किया कि छात्र आन्दोलन का अर्थ मात्र छात्र संघ एवं राजनीति है दूसरी ओर छात्रों को हिन्सावादी एवं अराजक सिद्ध करने में भी सफ़लता मिली। किन्तु यह भारतीय युवा का यथार्थ नही है मूलत: भारत का छात्र युवा न तो खाओ, पीओ, मौज उडाओ की अवधारणा वाला है न ही वह इसको अपने जीवन का यथार्थ मानता है । हाँ इन समस्त प्रयासों का परिणाम यह अवश्य रहा है कि भारतीय युवा में एक प्रकार का कैरियरिज्म प्रभावी हुआ है। किन्तु इस प्रभाव के कुछ सुपरिणाम भी आये। इन परिणामों ने छात्रान्दोलन की प्रासंगिकता को पुनर्सिद्ध किया है।
आज भारत विश्वविजेता बनने की भूमिका में है तो यह इसी युवा शक्ति की मेधा का प्रतिफ़ल है आज समस्त विश्व आशाभरी निगाहों से भारत की ओर देख रहा है तो युवा श्रम एवं कौशल के कारण से ही है। वस्तुत: छात्र आन्दोलन की प्रासंगिकता को समूचे राष्ट्रिय परिप्रेक्ष्य में न देख कर मात्र राजनीति के कोष्ठक में देखने वाले ही छात्र आन्दोलन को निष्प्रभावी एवं अप्रासंगिक कह सकते है। वस्तुत: सम्पूर्ण भारतीय परिदृश्य युवा शक्ति की गतिविधि से प्रभावित है। आन्दोलन का अर्थ ध्वंस नही अग्रगामी गति है। परिवर्तन की अग्रगामिता का निर्दश बना भारतीय युवा सभी मोर्चों पर भारत विजय का सपना साकार कर रहा है वह जीत रहा है और जीतेगा।
वास्तव में राष्ट्रीय विकास की गति के आलोक में युवा आन्दोलन को न देखने का कारण स्पष्ट है। इसे एक वर्ग शक्ति के रुप में स्थापित करना इस विधा में आसान है। इस पर एक ऐसा वर्ग जो कि अनुत्पादक है, एक ऐसा वर्ग जिस पर मात्र व्यय ही होने वाला है। कोढ में खाज मुहावरों को सटीक बैठाता उदारीकरण जनित व्यापारीकरण जिसमे उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन खपत की संतृप्तता के करण मन्दी ने घेर लिया था, को भी शिक्षा का बाजार प्राण वायु के रुप में दिखने लगा है। इन सब ने छात्र समुदाय को एक तरह से निराशा ही दी है।परिसर में आर्थिक शोषण और परिसर के बाहर भविष्य का अन्धेरा इन दोनों से संघर्ष करती छात्र शक्ति को अप्रासंगिक सिद्ध करना छात्र युवा के साथ अन्याय है।
आखिर किसी भी आपदा विभीषिका के समय प्रथम स्वयंसेवी के रुप में अपने को प्रस्तुत करने वाला युवा दिखता नही। भारत की रक्षा के लिए बलिवेदी पर चढने वाला युवा विभ्रम पैदा करने वलों को क्यों नहीं दिखता। भारत सहित समस्त विश्व में अपनी मेधा का लोहा मनवा रहा युवक क्यों नही सुर्खियां बनता है। आखिर युवा आन्दोलन को किस रुप में परिभाषित किया जायेगा। राष्ट्र के विकास में गतिशील योगदान कर रहा युवा, युवा आन्दोलन का ही प्रतिफ़ल है।घुसपैठ, आतंकवाद्, अशिक्षाके विरुद्ध लड रहा युवा छात्र युवा आन्दोलन ही है। मात्र सत्ता परिवर्तन का साधन बनाने की कोशिश और उसमे असफ़ल होने पर छात्र युवा आन्दोलन को निरर्थक तथा अप्रासंगिक सिद्ध करने वाले लोग युवा आन्दोलन के पर्याय से अपरिचित तथा विभ्रम के शिकार बुद्धिजीवी है। उनके लिए उनके शर्तों पर युवा आन्दोलन का न चलना ही श्रेयस्कर है।
तकनीक पर निर्भरता का का विस्तार मनुष्य के महत्त्व को कम करता है। तकनीक केन्द्रित जीवन की श्रेष्ठता का यशोगान करने वाले सर्वदा यह प्रयास करते हैं कि मानव मेधा की सभी सृजनात्मक गतिविधियों को मशीनी बना कर श्रम और समय को बचाया जाय। यह इसका स्वाभाविक उद्देश्य है। इसके साथ ही बचे हुये समय को ऐन्द्रिकोपभोग में लगाने के बहुविध उपक्रम खडा करके तकनीक जनित प्रयास उपभोक्ता संस्कृति का निर्माण करते है। इस अवस्था में सृजनात्मक कल्पना स्थगित हो जाती है उत्पादन और उपभोग ही मानवीय नियति बन जाती है।फल स्वरूप समाज ऎन्द्रिक स्तर पर जीवन जीने लगता है तथा परिवर्तन के प्रयास हिंसक मोड ले लेते हैं। भारतीय समाज जीवन में भी १९९० के बाद इस तरह की जीवन प्रणाली के प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगे हैं। इस प्रकार के जीवन का अभ्यास होने पर व्यक्ति नीजि सुख तथा तथा ऐन्द्रिक आस्वाद के लिये परिवर्तन के सजग, सकारात्मक एवं सगुण प्रयासों का बौद्धिक तर्को के आधार पर प्रतिरोध करता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पनपी यह प्रवृत्ति पूर्णतः यूरोपीय प्रत्यय है। भारत में इसने अपने पांव १९९० के बाद पसारे हैं । इस वृत्ति के समर्थक सामाजिक दण्डशक्ति के रूप में स्वतन्त्र छात्र आन्दोलन को अनावश्यक अप्रासंगिक तथा काल वाह्य मानते हैं। इस को स्थापित करने के लिये तर्क गढ़ा जाता है तथा गोयबेल्स के सिद्धान्त का अनुसरण करते हुये इन तर्कों को इतने जोर से प्रसारित किया जाता है कि कृत्रिम तर्क स्वाभाविक लगने लगता है। भारत में उपभोक्तावादी विखण्डित सामाजिक संरचना का प्रचार प्रसार करने वालों ने इसी पद्धति का अनुसरण किया है। इस दुष्प्रचार का शिकार देश की युवाशक्ति को होना पडा है। यह चर्चा दिग्भ्रमित युवा आन्दोलन जैसे विशेषणों से प्रारम्भ होता है तथा इसकी चरम निष्पत्ति छात्र युवा आन्दोलन को निरर्थक सिद्ध करने में होती है। यह विश्व व्यवस्था को संचालित करने के लिये विकसित उस नवप्रणाली का स्वाभाविक परिणाम है जो पश्चिम की वैचारिकी के उभय विध खांचे में फिट नही होती है क्योंकि यह न तो पूंजीवाद है न तो समाजवाद अपितु उपभोक्तावादी फलक्रियावाद से उपजी संकर प्रणाली है। जो समाज की संसक्तता को समाप्त करता है तथा वैयक्तिकता को पुष्ट करता है।
जो समाज यथास्थितिवादी नहीं है,सपने देखता है और सपनो को सच करने के लिये प्रयास करता है उस समाज में छात्र युवा आन्दोलन अपरिहार्य है। भारत का समाज स्वाभाविक रुप में ऐसा ही है। भारत की प्रगति समृद्धि तथा विश्वविजय की ओर बढ़ रही अप्रतिहत गति युवा गतिशीलता का ही परिणाम है। इस गतिशील विकास को समझने के लिये नब्बे के दशक के बाद की सामाजिक अभिवृत्ति को विश्लेषित करने एवं मूल्यांकित करने की आवश्यकता है। छात्र आन्दोलन को समाप्त करने तथा छात्र सक्रियता को स्तंभित करने के कारण भारत में किस प्रकार की समस्यायें आयी है इसका भी विवेचन आवश्यक है।
यदि भारतीय सन्दर्भों में छात्र सक्रियता का मूल्याकंन तथा उसकी प्रासंगिकता का विचार सही सन्दर्भों में करना है तो इसे मात्र सत्ता परिवर्तन के राजनीतिक साधन के रुप में देखने की सामान्य प्रवृत्ति से अलग सोचने की आवश्यकता भी है क्योंकि सत्ता परिवर्तन और राजसत्ता दखल के आन्दोलन वास्तविक छात्र युवा आन्दोलन नहीं हैं, अपितु यह राजनीतिज्ञों के द्वारा अपने दलीय हितो को लेकर किया जाने वाला उपक्रम मात्र है। अतः उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह द्वारा अथवा देश मॆ राहुल गांधी द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रमों को छात्र युवा आन्दोलन के पर्याय के रूप में देखना स्थिति का वास्तविक दर्शन नहीं है। इसका निहितार्थ तो छात्र युवा आन्दोलन को अप्रासंगिक सिद्ध करना ही है।
इसी प्रकार युवा आन्दोलन के दिन बीत गये इस प्रकार की भविष्यवाणी करने वाले लोग १९९० के बाद के उदारीकरण तथा तज्जन्य उपभोक्तावाद के अधिवक्ता एवं सृजनात्मक कल्पना से शून्य लोग हैं। उनके द्वारा परोसे जा रहे तथ्य इस देश के युवा मन का यथार्थ नहीं है। इसलिये यह आवश्यक है कि भारत के युवा का सच सामने आना चाहिये। उसे प्रचारित प्रसारित करने का बहुशः यत्न भी होना चाहिये। किन्तु भारतीय युवा का समकालीन रुप बाजार के विस्तार में सहायक नहीं है अतः इस को बाजार केन्द्रित विचार सरणि में स्थान नहीं प्राप्त हो सकता है। इन सब के होते हुये यह भी सच है कि समकालीन समाज का नियन्त्रण बाजार द्वारा हो रहा है न कि समाज में अनुकरण योग्य आदर्श प्रस्तुत कर सकने की क्षमता रखने वाले व्यक्तित्व वाले श्रेष्ठ जनों के द्वारा।
आज आवश्यक है कि स्वातन्त्र्योत्तर भारत में छात्र युवा आन्दोलन के महत्त्व तथा उसकी प्रभावकारी भूमिका का स्मरण किया जाय तथा १९९० के बाद की छात्र युवा गतिविधियों का समुचित मूल्यांकन हो। इसके बिना भारत में छात्र आन्दोलन की प्रासंगिकता का निषेध उचित नहीं है। सत्य तो यह है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति से अब तक का समकालीन इतिहास समर्थ, सशक्त और वैभवशाली भारत के निर्माण में अपना श्रेष्ठतम योगदान करने वाले छात्र आन्दोलन का ही इतिहास है। याद करें स्वतन्त्रता के बाद जब देश के संविधान निर्माण पर सामाजिक जीवन में चुप्पी थी, सन्नाटा पसरा हुआ था। संविधान सभा के बाहर देश की जनता को उसके स्वरुप तथा रचना के संबन्ध में बताने वाला कोई न था। तब इस देश के युवाओं ने रचनात्मक संघर्ष का व्रत लिया और भारतीयकरण उद्योग के नाम से एक छात्र आन्दोलन खडा हुआ। १९६२ मॆं चीन के आक्रमण के बाद पूर्वोत्तर की सीमा के मानवीय प्रश्न जिसे नक्शों और ग्रन्थों के आधार पर सुलझा या जाना संभव न था उसके लिये हृदय से संवाद करनॆ वाले मानवीय संवेदना से युक्त प्रयासो की आवश्यकता थी| यह स्थिति राष्ट्रीय परिदृष्य में चुप्पी की बन गयी थी। इस मौन को तोडने के लिये पूर्वोत्तर के लोगों से मिलकार हृदयपूर्वक संवाद स्थापित करने के लिये अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जब अन्तर्राष्ट्रिय छात्र जीवन दर्शन नाम प्रकल्प की शुरुआत की तो यह भारत के इतिहास में अनूठी घटना थी। यह रचनात्मक छात्र आन्दोलन की अनोखी पहल थी, इसने देश के उपेक्षित भूभाग के लोगों से हृदय से संवाद तथा समस्त भारत के साथ पूर्वोत्तर के युवाओं के समरस संवाद का जो वितान प्रस्तुत किया है वह किसी भी शासकीय प्रयास से संभव न था। यह सब युवा रचनाधर्मिता से ही संभव था और उसने कर दिखाया। १९७४ का छात्र आन्दोलन किस प्रकार दूसरी आजादी का आन्दोलन बना और लोकतन्त्र की समाप्ति के षडयन्त्र को अपने अदम्य पराक्रम से नेस्तनाबूँद कर छात्र शक्ति ने सामजिक दण्ड शक्ति की अपनी भूमिका को जिस यशस्विता के साथ सिद्ध किया वह इतिहास का विषय है।उस पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि अब बहुत कुछ कहने की आवश्यकत नही है।
इस आलेख में मैं इस पर केन्द्रित हूँ कि वर्ष ७७ के बाद भी छात्र आन्दोलन मरा नहीं है अप्रासंगिक नही हुआ है। कश्मीर की समस्या आज पूरे देश मे अपने वास्तविक एवं यथार्थ रुप मे जानी जा रही है तो यह देश के युवाओं के द्वारा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेतृत्व में चलाये गये आन्दोलन का ही परिणाम है।असम सहित समूचे भारत में घुसपैठ यदि केन्द्रिय समस्या बना है,लोगों की चिन्ता इस बात को लेकर घनीभूत हुयी है तो इसका श्रेय परिषद के नेतॄत्व में पले छात्र आन्दोलन को ही है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध १९८६-९० का संघर्ष हो अथवा कश्मीर की समस्या छात्र सक्रियता का ही परिणाम था कि इस पर समस्त समाज गंभीर हुआ। नब्बे के बाद अर्थात् वैश्विकता की कथित आंधी और उदारीकरण के व्यापारिक उपक्रम के साथ ही यह बात जोर-शोर से कही जने लगी कि छात्र आन्दोलन के दिन लद गये ।शायद इस लिये कि छात्र आन्दोलन को परिभाषित करने वाले इसे सत्ता परिवर्तन का माध्यम मानते है। चूंकि व्यापारीकरण बाजारीकरण के वैश्विक प्रयास में सरकरों की प्रासंगिकता ही समाप्त हो गयी । इसलिए छात्र आन्दोलन की भी निरर्थकता सिद्ध हो गयी है।किन्तु यह योजनबद्ध विभ्रम का निर्माण मात्र था। समस्त विश्व विशेषत: भारत में छात्र आन्दोलन सत्ता परिवर्तन का साधन नही रहा है। सत्ता परिवर्तन आन्दोलन का साधन अवश्य रहा है।वस्तुत: आन्दोलन तो हमेशा राष्ट्रिय सन्दर्भों में ही खडे हुए किन्तु सत्ता परिवर्तन के पडाव पर आते-आते उन आन्दोलनों ने दम तोड दिया । इसलिए राजनीति द्वारा व्यर्थ एवं अप्रासंगिक कहे जाने लगे।
१९९० से २००० के बीच के दस वर्ष तो इस देश में छात्र आन्दोलन के लिए अत्यन्त खराब रहे है क्योंकि वैश्विक व्यापारवाद के समर्थकों ने छात्र सक्रियता के खिलाफ़ बौद्धिक मुहिम चलायी और उसे सर्वथा अप्रासंगिक सिद्ध कर दिया ।इस काल खण्ड में विखण्डनवाद ,व्यक्तिवाद ,वैयक्तिक नीजता आदि जाने कितने प्रकार के सिद्धान्त गढे गये और उन तर्कों के आधार पर सामूहिक सक्रियता कि निस्सारता सिद्ध की जाने लगी। जिसका परिणाम हुआ कि राज सत्ता ने छात्रों की सक्रियता के सभी मंचों को प्रतिबन्धित करना, उपेक्षित करना प्रारंभ कर दिया। इसका निशाना छात्र संघ बने।
इस प्रयास ने दोधारी तलवार का काम किया। एक तरफ़ तो यह सिद्ध किया कि छात्र आन्दोलन का अर्थ मात्र छात्र संघ एवं राजनीति है दूसरी ओर छात्रों को हिन्सावादी एवं अराजक सिद्ध करने में भी सफ़लता मिली। किन्तु यह भारतीय युवा का यथार्थ नही है मूलत: भारत का छात्र युवा न तो खाओ, पीओ, मौज उडाओ की अवधारणा वाला है न ही वह इसको अपने जीवन का यथार्थ मानता है । हाँ इन समस्त प्रयासों का परिणाम यह अवश्य रहा है कि भारतीय युवा में एक प्रकार का कैरियरिज्म प्रभावी हुआ है। किन्तु इस प्रभाव के कुछ सुपरिणाम भी आये। इन परिणामों ने छात्रान्दोलन की प्रासंगिकता को पुनर्सिद्ध किया है।
आज भारत विश्वविजेता बनने की भूमिका में है तो यह इसी युवा शक्ति की मेधा का प्रतिफ़ल है आज समस्त विश्व आशाभरी निगाहों से भारत की ओर देख रहा है तो युवा श्रम एवं कौशल के कारण से ही है। वस्तुत: छात्र आन्दोलन की प्रासंगिकता को समूचे राष्ट्रिय परिप्रेक्ष्य में न देख कर मात्र राजनीति के कोष्ठक में देखने वाले ही छात्र आन्दोलन को निष्प्रभावी एवं अप्रासंगिक कह सकते है। वस्तुत: सम्पूर्ण भारतीय परिदृश्य युवा शक्ति की गतिविधि से प्रभावित है। आन्दोलन का अर्थ ध्वंस नही अग्रगामी गति है। परिवर्तन की अग्रगामिता का निर्दश बना भारतीय युवा सभी मोर्चों पर भारत विजय का सपना साकार कर रहा है वह जीत रहा है और जीतेगा।
वास्तव में राष्ट्रीय विकास की गति के आलोक में युवा आन्दोलन को न देखने का कारण स्पष्ट है। इसे एक वर्ग शक्ति के रुप में स्थापित करना इस विधा में आसान है। इस पर एक ऐसा वर्ग जो कि अनुत्पादक है, एक ऐसा वर्ग जिस पर मात्र व्यय ही होने वाला है। कोढ में खाज मुहावरों को सटीक बैठाता उदारीकरण जनित व्यापारीकरण जिसमे उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन खपत की संतृप्तता के करण मन्दी ने घेर लिया था, को भी शिक्षा का बाजार प्राण वायु के रुप में दिखने लगा है। इन सब ने छात्र समुदाय को एक तरह से निराशा ही दी है।परिसर में आर्थिक शोषण और परिसर के बाहर भविष्य का अन्धेरा इन दोनों से संघर्ष करती छात्र शक्ति को अप्रासंगिक सिद्ध करना छात्र युवा के साथ अन्याय है।
आखिर किसी भी आपदा विभीषिका के समय प्रथम स्वयंसेवी के रुप में अपने को प्रस्तुत करने वाला युवा दिखता नही। भारत की रक्षा के लिए बलिवेदी पर चढने वाला युवा विभ्रम पैदा करने वलों को क्यों नहीं दिखता। भारत सहित समस्त विश्व में अपनी मेधा का लोहा मनवा रहा युवक क्यों नही सुर्खियां बनता है। आखिर युवा आन्दोलन को किस रुप में परिभाषित किया जायेगा। राष्ट्र के विकास में गतिशील योगदान कर रहा युवा, युवा आन्दोलन का ही प्रतिफ़ल है।घुसपैठ, आतंकवाद्, अशिक्षाके विरुद्ध लड रहा युवा छात्र युवा आन्दोलन ही है। मात्र सत्ता परिवर्तन का साधन बनाने की कोशिश और उसमे असफ़ल होने पर छात्र युवा आन्दोलन को निरर्थक तथा अप्रासंगिक सिद्ध करने वाले लोग युवा आन्दोलन के पर्याय से अपरिचित तथा विभ्रम के शिकार बुद्धिजीवी है। उनके लिए उनके शर्तों पर युवा आन्दोलन का न चलना ही श्रेयस्कर है।
शनिवार, 13 नवंबर 2010
भारत का मूल विचार --- हिन्दुत्त्व- 2
जीवन और चिन्तन की इस विशिष्टता को हम निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझ ने का प्रयास करें तो संभवतया सर्वाधिक प्रभावकारी किन्तु उतने ही जटिल इस विषय को समझने में कुछ सौविध्य हो सकता है।
- दुनियाँ में श्रेष्ठतम चिन्तन
- विश्वमें प्रथम बार जीवन को वैचारिक आधार्
- अपरिवर्त्य (नित्य) विनाशी( अनित्य) के बीच समन्वय
- वैश्विक कल्याण की दृष्टि
- विज्ञान एवं अध्यात्म का समन्वय
यह सत्य है की वैचारिकी और चिन्तन के क्षेत्र में भारतीय चिन्तन जिसे हम सब हिन्दुत्त्व के नाम से जानते हैं, विश्व का अकेला विचार नहीं है। किन्तु यह सत्य है और विरोधपूर्वक अथवा अविरोधपूर्वक, जिस किसी भी रूपमें प्रत्येक व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि हिन्दू चिन्तन दूनियाँ का सबसे पुराना चिन्तन है। यह अत्यन्त प्राचीन काल से आज तक मूल रूप में जीवित चिन्तन है, अतः चिरन्तन चिन्तन है। इस विचार का उदय मानव चेतना और उसकी चिन्तन शक्ति के अभ्युदय के साथ ही होता है। यह एक विशिष्ट प्रकार की विश्वदृष्टि है। इस विश्व दृष्टि के तीन आधार हैं। प्रथम तो यह कि सत् एक (एकं सत्) अर्थात् समस्त जगत् एक अखण्ड ईकाई है, सम्पूर्ण जीवन एक अविभक्त रचना है। विभाजन या भेद प्रतीति के स्तर ही है। भेद की प्रतीति भी अभेद के धरातल पर ही होती है। यदि सभी प्रकार के अनुभव का आधार एक अविभक्त अखण्ड सत् नहीं है तो समस्त अनुभव विविक्त संवेदना है। यह भी कहा जा सकता है कि मात्र विविक्त संवेदना की सत्ता होने पर अनुभव संभव ही नहीं है। क्योंकि अनुभव भव के पश्चात् है। जो है या हो गया है, उसके ज्ञान को ही अनुभव कहते हैं। एक अनुभव का दूसरे अनुभव के साथ संवाद आवश्यक है। इसलिये विविध अनुभव को संभव बनाने वाली एक अखण्ड सत्ता अपरिहार्य है। प्रपंच की स्थिति प्रपंचातीत पर ही आधारित है।
दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण सिद्धान्त है सबको साथ देखना सर्वमयता में देखना। सर्वमयता में देखना, सबको देखना, साथ देखना ही सही देखना है। इसलिये हिन्दू सर्वत्र जीवन देखता है, मृत्यु नहीं। मृत्यु तो खण्ड में देखना है। कुछ देखना और कुछ को नहीं देखना है, भेद दृष्टि से देखना है। भेद दृष्टि भय उत्पन्न करती है। पराये और परायेपन के होने के अतिरिक्त भय कुछ भी नहीं है। जो अपना नहीं है वह भयभीत करता है।
नाश तो भारत की धर्म दृष्टि में कभी स्वीकार ही नहीं किया गया है। कुछ भी नष्ट नहीं होता है। जिसे सब नाश समझते हैं हिन्दू उसमें रुप परिवर्तन मात्र देखता है। इसीलिये मृत्यु देहावसान मात्र है। पंचमहाभूतों का विलयन मात्र है, विलगाव है नाश नहीं। स्थूल से सूक्ष्म तथा सूक्ष्म से स्थूल होने की प्रक्रिया जन्म और मृत्यु है। नाश शब्द न और आश् शब्द के योग से बना है। जिसका अर्थ है जैसा था वैसा नहीं है। इसलिये जब किसी वस्तु को नश्वर कहा जाता है तो इसका तात्पर्य परिवर्तनशीलता ही होता है। नहीं है समाप्त हो गया जैसे शब्द तो भारत की संस्कृति में कभी स्वीकृत ही नहीं रहे हैं। जो नहीं है, वह नही था। जो है, वह था और वह रहेगा। इस रहने और न रहने के बीच ही संभूति है। संभूति अर्थात् जो होता रहता है। यही होने की प्रक्रिया जब स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती है तो हम मृत्यु समझते हैं और जब सूक्ष्म से स्थूल की ओर होती है तो जन्म समझा जाता है।
इस दृष्टि को विज्ञान की तुला पर् तौला जा सकता है तो अध्यात्म की भूमि पर भी समझा जा सकता है। महर्षि अरविन्द के शब्दों में कहा जाय तो यह एक ही सत्ता के आरोह एवं अवरोह की ऐसी विधि है जिसका सैद्धान्तिक रुप से एक साथ भौतिक विज्ञान, जीवन विज्ञान तथा समाज विज्ञान में किया जाना सहज और सरल है।इसे सात्मीकरण और विभेदीकरण के आधार पर इस रुप में समझ सकते हैं कि जहां रूपं रूपं पर्तिरूपं बभूव – एकोsहं बहुस्यामः की सृष्टि प्रक्रिया है तो दूसरी ओर प्रतिरूप से विरूप होने की प्रणाली भी है। प्रतिरूपण बाँधता है, बांटता है। टुकडो में बंटी चैतन्य शक्ति को एकाकार करना ही मुक्ति है। मुक्ति इस लोक से परे घटने वाली कोई घटना नहीं है। अपितु इसी काल में, इसी जीवन में प्राप्य है क्यों कि यह और कुछ नहीं टुकडो में देखने वाली दृष्टि का नाश है। “सर्वदृष्टि प्रणाश” की यह मान्यता वैदिक एवं बौद्ध दोनो प्रणालियों को सहज स्वीकार है।
यह बात कुछ अजीब सी लगती है। इसलिये अजीब लगती है कि हमनें आधुनिकता के नाम पर एक विशिष्ट किस्म का चश्मा अपनी आँखों पर चढा लिया है जो इन्द्रियगोचर जगत् से परे किसी अन्य सत्ता की संभावना को इस आधार पर अस्वीकार नहीं करता कि सत्यापनीयता संभव नहीं है।सत्यापन किसी सत्तावान पदार्थ के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त नहीं है। विचारों के जगत (World of Ideas) में तो यह कथमपि संभव नहीं है। यदि इन्द्रिय गोचरता को ज्ञान की अनिवार्य शर्त मान लिया जाय तो ज्ञान में नवन्वोन्मेष की संभवना ही समाप्त हो जायेगी। इसी कारण भरतीय विचार प्रणाली ने इन्द्रियगोचरता को ज्ञान की उपष्टम्भक भूमिका तो स्वीकार की है लेकिन ज्ञान की अनिवार्य शर्त नहीं माना है।
पश्चिम में प्रमाणवादी चिन्तन ( Positivist Thinking) के उदय के पूर्व ही कुछ अन्य ऐसे विचार दिखाई देते हैं जिसके फल स्वरूप विश्व के उद्गम एवं अन्त की भौतिक, यान्त्रिक तथा संघर्षात्मक रचना की मान्यता को स्वीकृति प्राप्त हुई। यह आकिर्मिडीज की इस स्थापना के साथ शुरु होता है कि जगत् एक यान्त्रिक रचना है यान्त्रिक नियमोंके उपयोग से इसका रुप परिवर्तन हो सकता है। इसके साथ ही डार्विन के जैवविकासवाद तथा सुमेरन की की समाज की व्यावसायिक उद्यमशीलता ( Society is an Enterprise ) के सिद्धान्त ने इसकी जडात्मकता और यान्त्रिकता, को कठॊर सिद्ध तथ्य के रुप में स्थापित किया है। वस्तुतः पश्चिम में विकसित इस जगत की जडात्मकता और यान्त्रिकता का सिद्धान्त उसके सामी मूल में ही छिपा हुआ है। सामी धर्मों में पुरुष के अतिरिकत किसी अन्य जीव में आत्मा को मान्यता नहीं है। बडे विरोध और दबाव के बाद चर्च ने स्त्री देह में आत्मा को स्वीकार किया है। किन्तु यह मान्यता भी अभी उनकी पान्थिक सीमा में समानता के स्तर पर नहीं पहुंच सका है। इसके विपरीत भारतीय विश्वदृष्टि में इस जगत् तथा जगत से परे सर्वत्र एक ही चैतन्य के अभिव्य्जना को स्वीकार किया गया है। जिसने इस विश्व को जड यान्त्रिकत का शिकार नहीं होने दिया, न तो इस् विश्व को मनुष्य के उन्मुक्त उपभोग के साधन के रुप में भी नहीं स्थापित होने दिया।
भ्हारटीयता का हर्द यही है यही वह तीसरा विचार बिन्दु है, वह स्थला है जंहा भारत भारत भाव को प्रकर्ष रुप से प्रकाशित होता है।यह है मनुषय की सर्व कार्यक्षम क्षमता और असिंअ अधिकार की स्वीकृति के साथ ही स्वजन्य सीमांकन। उपनिषद् इसी को तेन त्यक्तेन भूञ्जीथा के भाव के साथ प्रकट करता है। वस्तुतः भोग कर्म का हेतु तथा कारण दोनो है। हेतू होने का अर्थ है जिसको अभिलक्ष्य करके कर्म में प्रवृत्ति होती है। लाघव से लक्ष्य सिद्धि होने पर गौरव प्रयास कोई नहीं करना चाहता है। इसी लाघव दृष्टि का परिणाम है कि पश्चिमी जीवन में धरती पर स्वर्ग रचने का प्रयास होता रहा है। उसका स्वाभाविक निहितार्थ उपभोग के भौतिक साधनो की उपलब्धि अर्जित करना ही है। इसके समानान्तर भारतीयता कर्म और विकर्म के बीच सन्तुलन है। उपभोग की स्वीकृतिपूर्वक उपभोक्तावाद का निषेध तथा त्याग का अंगीकरण है। त्यागपूर्वक उपभोग , सब कुछ स्वयं का होते हुये भी स्वयं को उपभोग का एकमेव अधिकारी न समझना ही त्यागपूर्वक उपभोग है। यह सृष्टि नित्य है, ईश्वर की चैतसिक अभिव्यञ्जना है। यह् अभिव्यञ्जना मनुष्य तथा मनुष्येतर सबके लिये समान ही है। पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती के लिये भी समान है। इसी कारण से यहां धर्मदृष्टि को सनातन कहा गया है। सनातन की स्वीकृति एक ऐसा विशिष्ट विधान है जो परिवर्तन और तथा नित्यता के बीच समन्वय करता है। यह मानवीय व्यवहार में जडता का निषेध तो करता ही है पूर्ववर्ती के निषेध का भी निषेध है। सनातनता पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती के बीच सातत्य है। साधन तो युग और काल की गति के साथ परिवर्त्य है। नितान्त प्राचीन के स्थान पर नित नूतन साधनों का अविष्करण करते हुए अधुनातन साधन सम्पन्नता तो वरेण्य है। पर साध्य का संशोधन न तो सम्भव है न तो अपेक्षित ही है। इस विषय में पूर्व में भी चर्चा कर चुका हूँ कि बन्धन को तोडना सीमाबद्धता को अस्वीकार करते हुए नि:सीम होना तो इस दृष्टि का स्वभाव ही है। यही स्वभाव-साध्य भी है किन्तु इस समय साध्य का अर्थ वैरागी होना नही है अपितु समग्र सक्रियता है। अपने परिवेश के प्रति सजग होना जिम्मेदार होना, सबका अवधान करते हुए मुक्ति की कामना संभव है। यह अवधान मात्र समकालीन के प्रति नही है अपितु पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती के प्रति भी है। इसलिए भावी जीवन के प्रति, वैयक्तिक नही सामूहिक जीवन के प्रति उत्तरदायित्व का भाव तथा उसकी पूर्ति का उपक्रम ही कर्म है। “ऋणत्रयं अपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्”। “पितृ ॠण,देव ॠण तथा ॠषि ॠण के रुप में तीन ॠण व्यक्ति के जीवन मॆं जन्म से प्राप्त है। इन ॠणॊं की पूर्तिपूर्वक ही, बन्धन से मुक्ति का मार्ग खुलता है। किन्तु तीन ॠणॊंसे बात समाप्त नही होती है। मनुष्य अपने जन्म से लेकर समग्र विकास यात्रा मे लोक से कुछ प्राप्त करता है, समाज से लेता है उसे भी ॠणके रुप में स्वीकार करते हुए नृ ॠण के रुप में एक चतुर्थ आयाम दिया गया।
ये ॠण अपने आप में मनुष्य के लौकिकीकरण या धर्म के ऐहिक जीवन के सरोकार को प्रतिपादित करने वाले हैं। पिता का ॠण पिता को नहीं लौटाना है। इसे पुत्र को सौपना है। गुरु का या आचार्य का ॠण गुरु दक्षिणा के रुप में आचार्य को नही वापस करना है, अपितु ज्ञान विज्ञान की परम्परा का विकास करते हुए उसे अपने आचार्य से प्राप्त के साथ उत्तरवर्ती पीढी को देना है।
यज्ञ अर्थात् कर्म की श्रृंखला-- कर्म तथा कर्मफल की कामना के लिए कर्म न करते हुए इदम् इन्द्राय न मम्, इदम् राष्ट्राय न मम् की भावना के साथ कर्म अकर्म है ।कर्तृत्वाभिमान ही सभी प्रकार के बंधनों का कारण है। कर्तापन का बोध व्यक्ति को फलोपभोग की कामना से बांधता है। यही सभी बन्धनो का मूल है। करते हुये बी नकरने का भाव मनुष्य को मुक्ति की ओर प्रगमित करता है। यह मुक्ति सहज नहीं है, कठिन तप है। इसपर सहज और सुकर तभी बनाया जा सकता है जब इसे सामाजिक व्यवस्था का भाग बनाया जाय। ऋणों की अवधारणा इसका प्रस्ताव है। दार्शनिक चिन्तन तथा अनुभव के विश्लेषण से प्राप्त सृष्टि के गुढ रहस्यों को जन साधारण के लिये प्रस्तुत करने का वैचारिक एवं व्यवहारिक उपक्रम है।
अकर्म का अर्थ कर्महीनता नहीं है। नैष्कर्म्यसिद्धि सम्पूर्ण सक्रियता है। इस सक्रियता का परिणाम रहा है कि तकनीक में उपयोगिता की चिन्ता और कामना किये बिना विज्ञान के विकास के विकास का प्रयास धार्मिक जीवन के पर्याय के रुप में देखा गया है। विद्या की उपासना अमरत्व के लिये अपेक्षित और आवश्यक मानी गयी है। विद्या की अवाप्ति का प्रथम सोपान मृत्यु पर विजय प्राप्त करना है। इस विजय प्राप्ति के उपक्रम में विद्या और अविद्या दोनो का समन्वय चाहिये। एक की उपासना में रत अन्धकार में जाता है। किन्तु अविद्या अर्थात् भौतिक दृष्टि से जगत् को जाननने समझने का प्रयास कभी भी उपेक्षा का विषय नहीं रहा है।
दुनियाँ के तमाम उपासना पन्थों ने विज्ञान की प्रगति तथा धर्मग्रन्थों के जगत विषयक व्याख्या के भेद पर वैजानिक अन्वेषणाओं का जिस प्रकार कठोर प्रतिवाद किया है वैसा कठोर प्रतिवाद नतो भारत में दिखाई देता है न तो भारत के वैचारिक धरातल पर संभव ही था। इसकि स्पष्ट करने के लिये मात्र एक उदाहरण ही पर्याप्त है कि आचार्य वराहमिहिर जैसा व्यक्ति उद्घोषणा करता है कि यवन म्लेच्छ होते हुये भी ऋषि के समान पूज्य हैं क्यों कि ज्योतिष के क्षेत्र मेंउन्होने प्रामाणिक ज्ञान अर्जित किया है। इस घोषणा का महत्त्व इसबात से समझा जा सकता है कि मन्त्रों के साक्षात्कार कर्त्ताओं के अतिरिकत किसी अन्य को ऋषि नहीं कह जाता है। तथापि वराहमिहिर यवन अध्येताओं को मात्र ऋषि कहने तक सीमित नहीं है अपितु वे उन्हे ऋषियों के समान ही पूज्य भी बताते हैं।
ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में सांस्कृतिक परिवेश से परे जाकर श्रेष्ठ सिद्धान्तों को ग्रहण करने तथा मान्यता देने की प्रणाली भारतीय परंपरा में प्रारंभ से ही प्राप्त है। इसे ऋग्वेद के इस मन्त्र में देखा जा सकता है कि आनो भद्राः क्रत्वोयन्तु विश्वतः, अर्थात श्रेष्ठ और शुभ विचारों को सम्पूर्ण विश्व से आने दो। इस के पीछे का वैचारिक कारण यह है कि हिन्दु जीवन दर्शन में यह मान्यता पर विश्वास नहीं करता है कि अन्तिम बात ईश्वरीय आदेश के रुप में कह दी गयी है। अब उससे आगे और कुछ भी नया कहे जाने की संभावना समाप्त हो गई है।
भारतीय धर्म दृष्टि को समझने के लिये सर्वाधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है संस्कार प्रणाली को समझना, यज्ञ के निहितार्थ एवं फलितार्थ को समझना। बिना संस्कार और यज्ञ को समझने बिना कॊई भी व्यक्ति हिन्दुत्व को नहीं समझ सकता है। संस्कार प्रकृत में सगुण एवं सचेत हस्तक्षेपपूर्वक संस्कृत का उदय है। इसीलिये जब हिन्दु जीवन की ओर देखता है तो मात्र सर्वमयता में नहीं देखता है संस्कारित सर्वमयता में देखता है। इस संस्कारित सर्वमयता में देखने का परिणाम है कि अशुभ का समानान्तर अस्तित्व इस संस्कृति में स्वीकार नहीं है। अशुभ और कुछ नहीं है यह मनुष्य के अज्ञान का परिणाम है, फल है। ज्ञान की उपलब्धि के साथ ही अविद्या का परिलोप हो जाता है। अज्ञान के तिरोभाव तथा ज्ञान के आविर्भाव के लिये संस्कारों की आवश्यकता होती है। संस्कार प्राकृत जीवन और प्राकृत शरीर में संस्कृति का उद्भावन है। शरीर पिण्ड को अनवरत संस्कारित कर उसे तेजोमय चैतन्यावच्छिन्न बनाने की विधि ही इस धर्म पथ को सनातन तथा सार्वकालिक आदर्श प्रणाली के रुप मे ढालती है।
संस्कार को हम सामान्य रुप में औपचारिक कर्मकाण्ड से अधिक कुछ भी नहीं समझते हैं। किन्तु संस्कार वाह्य आडम्बर या किसी धार्मिक विधि के क्रिया पक्ष मात्र नहीं हैं। अपितु यह श्रेष्ठ होने तथा तथा श्रेष्ठतम बनाने की भावना का उन्मेष है। जो प्राकृत है उसे संस्कृत करना अर्थात् और अधिक तोषदायक बनाना , सर्वसंगत बनाना ही संस्कार है। जीवन का प्रत्येक सोपान कर्मों की अविच्छिन्न श्रृंखला का परिणाम है। किन्तु कर्म परिणाम से उद्भूत जीवन को यथावत न रहने देना, अपितु सचेत मानव हस्तक्षेप के द्वारा उसे सगुण एवं सुष्ठु बनाना ही संस्कारों का वास्तविक उद्देश्य है।
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
सांस्कृतिक कार्यक्रम-
संस्कृति मनोरंजनपरक नहीं होती है इसलिये सांस्कृतिक कार्यक्रम मनोरंजन नहीं है।
यद्यपि की इसकी अभिव्यक्ति के साधन नृत्य, गान, वादन तथा अन्य दृक श्रव्य माध्यम ही होते हैं।
वस्तुतः संस्कृति की अनुभूति इन माध्यमों में सहजता से होती है।
क्योंकि ये ललित कलायें तथा मञ्चकलायें स्वयं में इतने चैतसिक प्रकार की होती है कि इनमें सभ्यता का भौतिक पक्ष अत्यन्त अप्रभावी रहता है।
इसके विपरीत सभ्यता से जुडी चीजें जैसे शासन प्रणाली, परिवहन और संचार के साधन, आवास आदि में भौतिक सुविधा का पक्ष महत्वपूर्ण होता है। अतः इसमें सांस्कृतिक पक्ष प्रखरता के साथ प्रकट नहीं होता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम का अर्थ नाच गाना नहीं है। किन्तु इसमें Folk का पक्ष इतना प्रभावी होता है कि सांस्कृतिक कार्यक्रम का अर्थ मनोरंजन के कार्यक्रम समझा जाने लगा है।
अब यह प्रश्न अवश्य है कि संस्कृति क्या है? तो इसका सहज और सीधा उत्तर है कि संस्कृति मनुष्य की वह सृजनात्मक गतिविधि है जो उसे प्राकृतिक स्थितियों से उपर उठाती है। उसके आहार, निद्रा भय मैथुन आदि स्वाभाविक प्रवृत्तियों को मूल्य व्यवस्था से नियामित और नियन्त्रित करती है।
नियमन और नियन्त्रण के इन आधारों को व्यक्ति तक संप्रेषित करने के लिये जिन उपायों का उपयोग किया जाता है वे प्रदर्शनात्मक प्रकृति के ही होते है। अतः उन क्रियाओं को अन्ततः सांस्कृतिक कार्यक्रम कहा जाने लगता है।
इसका एक दुष्परिणाम यह भी है कि अपसंस्कृति के भी प्रसार का भी यही तरीका है अतः इसे सांस्कृतिक गतिविधि से अलग करने का कार्य भी एक सचॆत और सक्रिय सामाजिक व्यवहार की अपेक्षा करता है।
जिसके कारण लोक कलाओं मे धार्मिक एवं अध्यात्मिक मूल्य भी डाले जाते है जिससे अपनी संस्कृति के प्रति उत्तराधिकार में प्राप्त श्रद्धा के कारण उसे अक्षुण बनाये रखें।
रविवार, 24 अक्टूबर 2010
भारत का मूल विचार --- हिन्दुत्त्व
भारत शब्द का अर्थ ही है विश्व की प्राचीनतम संस्कृति, श्रेष्ठतम जीवन प्रणाली,वितरण की समतामूलक ममतायुक्त समाजविधि, संस्कृतिनिष्ठ भक्तिपूरित राष्ट्रीयता, सर्वसमन्वयकारी सर्वसमावेशी उपासना प्रणाली। यह अभ्युदय और निःश्रेयस् का ऐसा धर्म संस्थान है जो रुढियों का विलोपन करने तथा लक्ष्य की संप्राप्ति के नये पथ को स्वीकार करने के लिये सहज प्रस्तुत है। जो जातीय सभ्यता के निषेधपूर्वक जातीय वैशिषट्य को सार्वजनीन् बनाने का अनुपम प्रस्ताव है।
विचारों के इतिहास पर एक विहंगम दृष्टि डाली जाय तो सहज एवं निःशंक रुप से यह कहा जा सकता है कि भारतीयता या हिन्दुत्त्व सत् एवं ऋत् का एक ऐसा गठबन्धन है। जिसमें सभी प्रकार की वैयक्तिक विशिष्टताओं का समग्र के लिये समर्पण एवं समग्र के वैशिष्ट्य का सभी विशेषों में आप्लावन होता है।
इस संस्कृति या विचार परंपरा की यह महनीय विशेषता है कि इसमें शेष विश्व के कथित अधुनातन मूल्यों को दूनियाँ के इतिहास में प्रथम बार अभिव्यक्त एवं प्रयुक्त किया गया है। जब आधुनिक विश्व १९८० के बाद नयी करवट ले रहा था उत्तर आधुनिकता के नये ढाँचे को स्वीकार करते हुये वैश्विक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को संरक्षण के लिये बहुलवादी समाज रचना को वैश्विक स्वीकृति प्रदान कर् रखा था। तब भारत की समझ तथा हिन्दुत्व के उत्स की पहचान रखने वाले लोगों को अथर्ववेद का पृथ्वीसूक्त अत्यन्त स्वाभाविक रूपसे इस प्रकार की समाज रचना का सूत्र प्रस्तावित करता हुआ दिखा। यही ऐसे कारण रहे हैं कि यह विचार सैद्धान्तिक रुप में तो दूनियाँ में श्रेष्ठतम तो रहा ही है। व्यवहारिक अनुप्रयोग की दृष्टि से उत्कृष्टतम चिन्तन का प्रथम प्रयोक्ता भी है। साथ ही इस विचार प्रणाली की त्रिकालाबाधित प्रासंगिकता भी सिद्ध है।
यहाँ ज्ञान एवं कर्म, बोध एवं आचार के बीच अद्वैध की स्थिति सहज ही मान्य है। इस मान्यता ने हिन्दुत्व को एक ऐसी जीवन प्रणाली के रुप में विकसित किया जो अपरिवर्तनशील लगता है। किन्तु यह अपरिवर्तनशीलता भौतिक नहीं है। भौतिक संसार तो परिवर्तनशील ही है, परिवर्तन है तो संसार है।संसरण ही संसार है। यह संसरण नहीं तो संसार नहीं। यह संसरण या गतिशीलता संसार का धर्म है इसको स्वीकार करना तथा सभी प्रकार के परिवर्तनों को अपरिवर्त्य आधार पर अधिष्ठित मानना अर्थात् अपरिवर्तनशील मूल भित्ति पर भौतिक परिवर्तनो को स्वीकृति देते हुये आगे बढने वाली जीवन प्रणाली की स्थापना हिन्दुत्व है।
विश्वतोमुखता को ध्यान में रखते हुये हिन्दुत्व की वैचारिक अवधारणा का विश्लेषण उसे अपनी वैचारिक मर्यादा में वैश्विक कल्याण के श्रेष्ठतम चिन्तन के रुप में प्रस्तावित करता है। सर्वे भवन्तु सुखिनः मात्र भौतिक स्तर पर् सबके सुख की कामना नहीं है अपितु कायिक वाचिक एवं मानसिक स्तरों पर सबके कल्याण का विचार है। भवन्तु सर्व मंगलम् इस विचार प्रणाली का ध्येय है।
हिन्दुत्व का वैशिष्ट्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास है।यह जीवन प्रणाली ऐसी विधि है जो भौतिकता और आध्यातिम्कका समन्वय कर समत्व के मार्ग का प्रतिपादन करती है। हिन्दुत्व अपने मूल उत्स में अनादि से अनन्त तक विस्तृत अखण्ड काल में मानव की जीवन यात्रा का वह अनुपम पथ है जिसमें व्यक्ति वर्तमान में स्थित हो कर अतीत अएवं अनागत दोनो के साथ स्वयं को सम्बद्ध करता हुआ अपनी दैशिक एवं कालिक सीमाओं को बहुतर विस्तार देता है।
दुनियाँ में प्रचलित विविध जीवन दृष्टियों में हिन्दुत्त्व की जीवन दृष्टि एक विशिष्ट जीवन दर्शन का प्रस्ताव करती है। इसके शतशः कारण हैं कि हिन्दुत्व को अलग एवं विशिष्ट समझा जा सके। किन्तु अलग या विशिष्ट होना इसका वैशिष्ट्य नहीं है। अपितु इसकी सर्वसमावेशिता तथा सात्मीकरण की अनुपम प्रणाली ही इसे अन्यों से अलग एवं महत्वपूर्ण बनाती है।
रविवार, 29 अगस्त 2010
रच दें पुनः धर्म युद्ध
²Éपर का महाभारत अधिकार खो देने वाले राजकुमारों के द्वारा किये गये संघर्ष की कहानी है। उस युग में धर्म ऊंघ रहा था। आज जब कलि का प्रथम चरण है। धर्म पहली नींद सोया हुआ है। विग्रहवान धर्म राम बन्दी हैं। राजसत्ता ने अखिल ब्रह्माण्ड नायक कोटि कॊटि विश्व के प्रभु राम पर कब्जा कर लिया है। न्याय तथा दुष्ट दलन के एकमेव भरोसा राम स्वयं न्याय के लिये आस लगाये बैठॆ हैं। अधर्म और अन्याय के नाश के लिये प्रकट हुये भगवान स्वय़ं न्याय के लिये अपलक आस लगाये बैठे हैं। दुष्ट दलन, के लिये अवतरित प्रभु , अशरणशरणदाता करुणामूर्ति स्वयं शरण की तलाश कर रहे हैं। इससे अधिक दुःखदायी कोई बात नहीं हो सकती है यही भारत में नये महाभारत की परिस्थिति है।
न्यायालय का निर्णय आने वाला है। कोटि कॊटि हिन्दु जन की अविचल श्रद्धा के केन्द्र राम जन्मभूमि पर मालिकाना हक का फैसला आने वाला है, यह एक ऐसा मुकदमा है जिसमें स्वयं राम वादी है। न्याय के स्रोत, विग्रहवान धर्म को भी अदालत जाना पडा है। यह कोई खराब बात नहीं है न्याय की तुला पर सब समान है इसका इससे श्रेष्ठ उदाहरण भी नहीं हो सकता। पर प्रश्न यह है कि क्या राम को न्याय मिलेगा। क्या अशरण-शरण, त्रैलोक्य नायक सर्वदुःखभंजक असुर-दलदलन-तत्पर मर्यादा पुरुषोत्तम को शरण मिलेगी।
राम को राम का ही न्याय चाहिये। रामराज्य का न्याय चाहिये। सुकरात को मिले पश्चिमी लोकतन्त्रवादी न्यायालय का न्याय नहीं। तर्क से ,जिरह से , युक्ति से और अभियुक्ति से न्याय नहीं निर्णय मिलता है। ध्यान रहे निर्णय न्याय हो यह जरूरी नहीं है। व्यक्ति न्याय तभी दे सकता है जब वह व्यक्ति की परिधि से उपर उठ कर स्वयं विग्रहवान न्याय बन जाता है, न्यायमूर्ति हो जाता है। इसीलिये राम को विग्रहवान धर्म कह गया है वे सब के साथ न्याय करते हैं। कैकेयी, ताडका, सूपर्णखा , मारिच खर-दुषण त्रिसिरा सहित सभी असुरो साथ तो करते ही हैं, कुत्ते और गिलहरी को भी न्याय देते हैं। पर जब स्वयं न्यायमूर्ति, धर्मविग्रह न्यायालय में हो तो उसे न्याय कौन देगा। यह प्रश्न विकट है सकल विश्व के जन्म मरण के समय और स्थान एवं स्वरूपका निश्चय करने वाले प्रभु भी अपनी इस मायिक लीला के विस्तार के चक्कर में फंस गये हैं। उनकी ही रचना उनके स्वरुप और स्थान को संशययुक्त कर रही है।
यही धर्म के क्षरण का काल खण्ड है। जब स्वयं धर्म ही प्रश्नों के दायरे में है। ज्योतिपुंज को दीपक की रोशनी में देखने का प्रयास हो रहा है। इससे अधिक कठिन दिन क्या होगा कि ईश्वर से उसके होने का प्रमाण मांगा जाय। अतः इस विकट स्थिति में जन जन के प्राण धर्म के विग्रह राष्ट्र के आराध्य राम को न्याय मिले, ज्योतिपुंज से काले बादल छंटे धर्मोष्मा से धरती उष्म धर्मा हो, प्रशीतित न्याय प्रवाहित हो, इसके लिये प्रिय अप्रिय किसी को भी धर्मार्थ दण्डित करने का साहस हर हृदय में जगाना होगा।
न्याय कभी भी मात्र याचना से नहीं मिलता है, याचना से तो मात्र निर्णय मिलता है। पराक्रम न्याय की कसौटी है। अतः समाज को अपना पराक्रम दिखाना होगा। फिर एक बार हूंकार भरनी होगी। राम के देश में राम जन्म भूमि पर विवाद हो यह पराक्रम को चुनौती है। प्रत्येक भारतवासी की अस्मिता पर उठा प्रश्न है।
यही अवसर है अपनी अस्मिता की पहचान को स्थायी करने का। आइये अनादि इतिहास से चल रही धर्म रक्षण की अपनी गौरव गाथा को एक बार पुनः दुहरायें, नये शब्दों में नयी भाषा में अपने राममय इतिहास का पुनर्लेखन करॆं।
सोमवार, 23 अगस्त 2010
ईसाईयत का शताब्दी अभियान???????????
ईसाईयत का शताब्दी अभियान???????????
by Rajaneesh Shukla on Saturday, August 2३, 2010
'क्रिश्चियन वेदान्तिज़्म' पर एक लेख में श्री आर. गोर्डन मिल्बर्न लिखते हैं, ''भारत में ईसाई धर्म को वेदान्त की आवश्यकता है। हम धर्मप्रचारकों ने, इस चीज़ को जितनी स्पष्टता से समझ लेना चाहिए था, अभी नहीं समझा है। हम अपने निजी धर्म में स्वतंत्रता और उल्लास के साथ आगे नहीं बढ़ पाते हैं; क्योंकि ईसाई धर्म के उन पहलुओं को व्यक्त करने के लिए जिनका सम्बन्ध ईश्वर की सर्वव्यापकता से अधिक है, हमारे पास अभिव्यक्ति के प्रर्याप्त शब्द और प्रकार नहीं हैं। एक बहुत ही उपयोगी कदम यह होगा कि वेदान्त-साहित्य के कुछ ग्रंथों या अंशों को मान्यता दे दी जाए, और उन्हें 'विधर्मी ओल्ड टेस्टामेंट' की संज्ञा दी जा सकती है। तब चर्च के धर्माधिकारियों से इस बात की अनुमति मांगी जा सकती है कि उपासना के समय न्यू टेस्टामेंट के अंशों के साथ-साथ, ओल्ड टेस्टामेंट के पाठों के विकल्प के रूप में, इस विधर्मी ओल्ड टेस्टामेंट के अंश भी पढ़े जा सकते हैं। इंडियन इंटरप्रेटर 1913 ।
१९११ में जो प्रस्ताव था वह २०१० आते आते ईसाई मत मॆ स्वीकार्य तथ्य हो गया। पर यह सर्व धर्म समभाव नहीं है इसके निहीतार्थ को विवेचित करने की आवश्यकता है। देश केलिये यह आवश्यक विमर्श का बिन्दु है इस पर आपके विचार का आह्वान करता हूं।
इस दिशा में हुये एक दशक के परिवर्तनो का मै साक्षी हूं, कैसे भारत को ख्रीस्त साम्राज्य बनाने के षड्यन्त्र हुये है उसको नजदीक से देखा है चर्चा बढेगी तो खुलासा भी होगा।
सोमवार, 8 मार्च 2010
दैनिक जीवन में वास्तुशास्त्र
दैनिक जीवन में वास्तुशास्त्र
डा. रजनीश कुमार शुक्ल
वास्तु शास्त्र गृह निर्माण की कला को कहते हैं, यह एक शास्त्र है और ऐसा शास्त्र है जो हमें, गृह में रहने के लिए उपयुक्त उर्जा ,सकारात्मक वायु , स्वक्ष जल, आकाश , और वो भूमि खंड जहा हमें निवास करना चाहिए का ज्ञान प्रदान करता है । इन पांचो तत्त्वों का जिस भवन में परिपूर्ण समावेश हो वह स्थान वास्तु के दृष्टि से अति उत्तम माना जाता है । वास्तु एक ऐसी कला है जो भवन निर्माण के लिए उपयोग की जाती है । अगर वास्तु का इतिहास अगर देखा जाए तो त्रेता युग में लंका हो या द्वापर में इन्द्रप्रस्थ या हस्तिनापुर या खुद भगवान् कृष्ण के लिए द्वारका का निर्माण हो वास्तुविदों द्वारा ही किया गया था। उसके बाद की वास्तु कला का नमूना देखे तो चाहे मुग़ल हो या बौद्ध स्थापत्य हो या राजस्थान के भवन या रोमन कला अर्थात अंग्रेजो की भवन कला सर्वत्र वास्तु का महत्त्व देखा जा सकता है।
पर सामान्य मनुष्य वास्तु के हिसाब से ही भवन क्यों बनाये। मनुष्य के जीवन पर इसका आखिर क्या प्रभाव पड़ता है ? इस प्रश्न का विवेचन आवश्यक है यद्यपि इस का उत्तर अत्यन्त सरल तथा सबको ज्ञात है, मानव शरीर पांच तत्वों से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, अंतरिक्ष से निर्मित है और प्रकृति भी इन पांच तत्वों का समग्र योग है।
एक मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए वायु, जल, सूर्य की रौशनी, खुला आसमान, अग्नि और भूमि का एक टुकडा चाहिए।वास्तुशास्त्र भवन निर्माण में प्रकृति के पांच प्राकृतिक बलों या तत्वों के साथ हमारे शरीर के पांच तत्वों के तालमेल का ज्ञान है।
वास्तु से हमें दिशा का ज्ञान प्रदान करता है अर्थात यह कि कौन की दिशा हमारे लिए कितनी अच्छी है और क्यों है ? हम सब जानते हैं कि किसी भी मनुष्य के जीवन पर सूर्य के प्रकाश का प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण होता है लेकिन सूर्य की रोशनी किस दिशा में हमें क्या प्रभाव देगी ? अगर उसके ऋणात्मक प्रभाव प्रभाव हैं तो वे कैसे समाप्त हो और ऊर्जा का सकारात्मक प्रभाव कैसे प्राप्त किया जाए आदि प्रश्न अत्यन्त महत्त्व के हैं। सूर्य पूर्व से उदय होते हैं और पूर्व से दक्षिण की यात्रा करते हुए पश्चिम में जा कर उनका प्रकाश अस्त होता है तथा पश्चिम से उत्तर होते हुए पूर्व में फिर उदयमान होता है। सूर्य उत्तरायण से दक्षिणायन और दक्षिणायन से उत्तरायण की यात्रा करते हुए वर्ष भर में १२ राशियों की परिक्रमा करते है सूर्य के इस यात्रा के प्रभाव से ही ऋतुओ का आगमन होता है जिसका प्रभाव मनुष्य पर प्रत्यक्षतः पड़ता है
दिशा के हिसाब से पूरब व पश्चिम की दिशा को अत्ति महत्वपूर्ण माना जाता है । उत्तर और दक्षिण की दिशा का महत्व धरती के उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवो के प्रभाव से सम्बन्धित है ,उत्तरी ध्रुव से चुम्बकीय किरणे दक्षिण ध्रुव की और जाती है और इन किरणों का प्रभाव हम पर पड़ता है तथा ये सूर्य के प्रभाव के भांति ही लाभप्रद होती हैं । वास्तु शास्त्र इस उर्जा से लाभ उठाने के लिए उचित व्यवस्था वाला भवन निर्माण का निर्देश देता है ।
वास्तु में सबसे महत्वपूर्ण है दिशा जैसे : पूर्व(सूर्य), पश्चिम(शनि), उत्तर (बुध) ,दक्षिण (मंगल), दक्षिण पूर्व या आग्नेय कोण (शुक्र ) ,दक्षिण पश्चिम या नैऋत्य कोण ( राहू), उत्तर पश्चिम या वायव्य कोण ( चंद्रमा ), उत्तर पूर्व अर्थात ईशान कोण ( गुरु )। इन आठ दिशाओं का वास्तु में अत्यधिक महत्व है। दिशा चयन तथा चयनित दिशा के अनुसार भवन निर्माण को वास्तु कला माना जाता है। दिशा के स्वामी अपने गुण स्वभाव के अनुसार ही प्रभाव डालते है और स्वस्थ जीवन, सुखमय जीवन के लिए इन रहस्य को समझना बहुत जरूरी है । तथा यह जानकारी हमें वास्तु शास्त्र से ही प्राप्त हो सकता है
वास्तु शास्त्र की रचना मानव जीवन को सुखमय बनाने के उद्देश्य से की गयी है। सुखमय जीवन की सबसे बड़ी धुरी है अर्थ। अर्थागम के लिए ही मनुष्य व्यवसाय करता है। किसी भी व्यवसाय के मूल में मानव का अर्थ चिन्तन ही होता है। आज व्यवसाय प्रबन्धक भी मानव संसाधन के महत्व को समझने लगे हैं। समुचित तथा योग्य टीम सही वातावरण तथा उचित साधनों के माध्यम से किसी भी कार्य को सही तरीके से अंजाम देने में सक्षम होती है। समझदार व्यवसायी हमेशा सही टीम की खोज में रहता है। किंतु टीम को आकर्षित करने के लिए एक अच्छा वास्तु वातावरण सदैव उपयोगी रहता है। इस कार्य के लिए सही वास्तु वातावरण वह स्थान दे सकता है जहां की कास्मिक, ग्लोबल तथा टेल्युरिक तीनों प्रकार की ऊर्जायें अच्छी हों, संतुलित हों। कास्मिक ऊर्जा जहां सही निर्णय लेने की क्षमता देती है जो कि सही चुनाव करने के लिये आवश्यक है। वहीं ग्लोबल ऊर्जा में विशिष्ट आकर्षण शक्ति होती है। यह आकर्षण शक्ति अधिक से अधिक लोंगो को स्थान विशेष की ओर आकर्षित करती है। यह ऊर्जा जहां होती है वहां का माहौल खुशहाल और भरा-पूरा रहता है, लोंगो का उत्साह बढ़ता है। भवन की ऊर्जाओं को संतुलित करने के लिए कुछ अन्य वैज्ञानिक वास्तु के नियम भी आवश्यक है, जैसे कार्य करने वाले के बैठने की दिशा तथा स्थान विशेष में प्रयोग किये गये रंग। सामान्यतः पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठना विद्याध्यन, रिसर्च कार्य तथा ईमानदारी पूर्वक किये जाने वाले कार्यों के लिये उपयोगी है। उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठना मैनिपुलेशन के कार्यों के लिये उपयोगी होता है। भवन अथवा कार्यस्थल की आंतरिक सज्जा इस प्रकार होनी चाहिये कि उत्तर तथा पूर्व का हिस्सा छत का हो इसके अतिरिक्त ईशान्य की तरफ स्थान का खुला होना भी सहयोगी होता है। दक्षिण पश्चिम का हिस्सा ऊँचा तथा भारी होना आवश्यक है।
ये सामान्य नियम उपयोगी तो हैं किंतु आंतरिक साज-सज्जा में प्रयोग की गयी वस्तुओं की भी अपनी ऊर्जा का भी सकारात्मक होना अति आवश्यक है, यह हमेशा याद रखना चाहिए कि नकारात्मक ऊर्जा वाली वस्तुयें भवन का पूरा आंतरिक वातावरण नष्ट कर सकती हैं।